पेपर लीक सरगना संजीव मुखिया ने बेटा के लिए खड़ी की परीक्षा बेचने की इंडस्ट्री !
बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) और सीबीआई दोनों एजेंसियां इस घोटाले की तह तक पहुंचने में जुटी हैं। ईओयू जल्द ही संजीव मुखिया को दोबारा रिमांड पर लेने जा रही है, जिससे नेटवर्क की बची हुई कड़ियाँ भी उजागर हो सकें...
पटना/नालंदा (नालंदा दर्पण)। ‘मैंने नौकरी और दाखिला बेचने की इंडस्ट्री खड़ी की… 12 साल तक हर परीक्षा मेरी उंगलियों पर चलती थी’। यह कोई फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि देश की सबसे संवेदनशील परीक्षाओं को खेल बना देने वाले बिहार के कुख्यात पेपर माफिया संजीव मुखिया की खुद की स्वीकारोक्ति है। नीट पेपर लीक कांड की जांच में जब संजीव की परतें खुलनी शुरू हुईं तो सामने आई एक अपराध, लालच और सिस्टम की बेबसी से भरी सच्चाई, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस संगठित अपराध का बीज सिर्फ एक ख्वाहिश से पड़ा- बेटे को डॉक्टर बनाना है। वर्ष 2016 में संजीव मुखिया ने अपने बेटे शिव कुमार उर्फ डॉ शिव के लिए पहले ही नीट का पेपर खरीद लिया था। अमित कुमार नामक शख्स की मदद से सिस्टम को मैनेज कर बेटे का भविष्य डॉक्टर की डिग्री से पक्का कर दिया गया।
लेकिन यहीं मामला नहीं रुका। बेटे के डॉक्टर बनने की मंशा ने एक प्रोफेशनल अपराध नेटवर्क का रूप ले लिया। नीट, एम्स, बीपीएससी, एसएससी और रेलवे जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाएं इस रैकेट के निशाने पर आ गईं।
इस समय बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) और सीबीआई दोनों एजेंसियां इस घोटाले की तह तक पहुंचने में जुटी हैं। ईओयू जल्द ही संजीव मुखिया को दोबारा रिमांड पर लेने जा रही है, जिससे नेटवर्क की बची हुई कड़ियाँ भी उजागर हो सकें। जांच में अब तक 32 मोबाइल नंबर, 17 बैंक अकाउंट और 6 कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच हो रही है।
संजीव ने स्वीकार किया है कि वर्ष 2008 में खगड़िया के अमित कुमार के साथ मिलकर इस रैकेट की नींव रखी। जल्द ही नेटवर्क रोहतास, नालंदा, शेखपुरा, गया और झारखंड तक फैल गया। वर्ष 2012 में महादलित क्लर्क भर्ती परीक्षा में पहली बार ब्लूटूथ सेटिंग से पेपर सॉल्व कराने का प्रयोग किया गया।
उसी साल वह गिरफ्तार भी हुआ, लेकिन जेल से छूटते ही उसका माफिया नेटवर्क और भी मजबूत हो गया। 2013 में SAIL की मैनेजमेंट ट्रेनी परीक्षा में पेपर लीक हुआ और उम्मीदवारों से 50-50 हजार रुपये वसूले गए। धीरे-धीरे मुखिया ने स्कूल, कॉलेज, प्रेस, लॉजिस्टिक्स और परीक्षा केंद्रों में गहरी पैठ बना ली। परीक्षा से जुड़े हर तत्व पर उसका नियंत्रण था।
जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क से सैकड़ों लोग जुड़े हैं- मध्यस्थ, शिक्षा संस्थान, अधिकारी और तकनीकी जानकार। यह गिरोह सिर्फ परीक्षा लीक नहीं करता था, बल्कि पेपर सेटिंग, केंद्र निर्धारण, मोबाइल सेटअप और रैकेटिंग के लिए पूरे सिस्टम को खरीद चुका था।
अब संजीव मुखिया को दोबारा रिमांड पर लेकर उसके नेटवर्क के सभी छुपे चेहरे उजागर करने की तैयारी हो चुकी है। देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं को ठगने वाले इस रैकेट का पर्दाफाश न सिर्फ बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि एक अपराधी जब सिस्टम से तेज़ चलता है, तो पूरी व्यवस्था कैसे घुटने टेक देती है।





