
राजगीर (नालंदा दर्पण)। सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का गढ़ राजगीर आज एक गंभीर प्राकृतिक संकट का सामना कर रहा है। इसकी जीवंत मिसाल हैं यहां के सुप्रसिद्ध गर्मजल के कुंड और झरने अब प्रकृति की मार झेल रहे हैं। गर्मी की शुरुआत के साथ ही राजगीर के कई ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले कुंड गंगा-यमुना, अनंत ऋषि कुंड, व्यास कुंड आदि पूरी तरह सूख चुके हैं। मार्कण्डेय कुंड भी अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। इसके अलावा सात ऋषियों के नाम पर विख्यात सप्तधारा के झरनों की जलधारा भी पहले से काफी कमजोर हो चुकी है। यह स्थिति न केवल पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत है, बल्कि राजगीर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए भी एक बड़ा खतरा बनकर उभरी है।
राजगीर के गर्मजल कुंड और झरने हजारों वर्ष पुराने हैं। मान्यता है कि इनका निर्माण भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र और राजगीर साम्राज्य के पहले राजा, राजा बसु के समय हुआ था। महात्मा बुद्ध और जैन तीर्थंकर महावीर ने भी इन कुंडों और झरनों में स्नान किया था। इन गर्म जल स्रोतों की औषधीय विशेषताओं और धार्मिक महत्व के कारण हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक राजगीर का रुख करते हैं। ये कुंड और झरने न केवल आस्था का केंद्र हैं, बल्कि राजगीर के पर्यटन उद्योग की रीढ़ भी हैं। हालांकि अब इन जल स्रोतों का सूखना आस्था को ठेस पहुंचा रहा है और पर्यटन पर भी गहरा असर डाल रहा है।
इस प्राकृतिक संकट के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन, वनों की अंधाधुंध कटाई, अनियोजित शहरीकरण और चापाकल व बोरिंग के जरिए भूजल का अत्यधिक दोहन प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। इसके अलावा वैभारगिरी पर्वत के शिखर पर स्थित भेलवाडोभ जलाशय का सूखना भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। जानकारों के अनुसार भेलवाडोभ जलाशय पहले साल भर पानी से भरा रहता था और उस समय झरनों से पानी गिरने की आवाज दूर गौरक्षिणी तक सुनाई देती थी। अब यह जलाशय बारहों महीने सूखा रहता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि भेलवाडोभ जलाशय का पानी राजगीर के ब्रह्मकुंड क्षेत्र के गर्मजल कुंडों और झरनों से जुड़ा हुआ है। जलाशय के सूखने से झरनों का प्रवाह रुक गया और कुंड सूखने लगे।
पहाड़ियों की गोद में बसे राजगीर का जो पारिस्थितिकी तंत्र इन प्राकृतिक जल स्रोतों को पोषित करता था, अब वह कमजोर पड़ चुका है। भेलवाडोभ जलाशय के लगातार सूखे रहने से झरनों और कुंडों का जल स्तर घटना पर्यावरणीय असंतुलन का स्पष्ट परिणाम है। यदि इस दिशा में तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट और गहरा सकता है।
इस संकट से निपटने के लिए प्रशासन, स्थानीय समुदाय और पर्यावरणविदों को मिलकर काम करना होगा। कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। जैसे- भेलवाडोभ जलाशय के रिचार्ज जोन का संरक्षण और जल संचय के उपायों को बढ़ावा देना। वनों की कटाई पर रोक लगाकर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना। कुंड क्षेत्र के सभी डीप बोरिंग और हैंडपंप को बंद करने पर विचार करना। सूख चुके कुंडों और झरनों की मरम्मत और उनके प्राकृतिक प्रवाह को पुनर्जनन करना। लोगों को इन प्राकृतिक धरोहरों के महत्व के बारे में जागरूक करना ताकि वे संरक्षण में भागीदार बनें।
राजगीर की पहचान केवल इसकी पुरातात्विक धरोहरों और मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहां के जीवंत जल स्रोत और प्राकृतिक सौंदर्य इसकी आत्मा हैं। यदि इन जल स्रोतों को बचाने के लिए समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इन कुंडों और झरनों की कहानियां केवल किताबों में ही पढ़ पाएंगी। यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि राजगीर की इस अनमोल धरोहर को संरक्षित करें और इसे भावी पीढ़ियों के लिए जीवित रखें।
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