नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत का एक ऐसा शिक्षा केंद्र रहा, जिसने न केवल भारत बल्कि विश्व भर के विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। बिहार के राजगीर के पास स्थापित यह विश्वविद्यालय 5वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक ज्ञान का एक प्रमुख केंद्र रहा। बौद्ध दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। लेकिन इसकी भव्यता और वैभव के साथ-साथ इसके कुछ रहस्य आज भी अनसुलझे हैं, जो इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को आकर्षित करते हैं।
नालंदा की स्थापना गुप्त वंश के शासकों के संरक्षण में हुई थी। माना जाता है कि सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने इसका आधार रखा। यह विश्वविद्यालय अपने समय का सबसे बड़ा शिक्षण संस्थान था, जहां 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 शिक्षक एक साथ अध्ययन और शिक्षण में लीन रहते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने अपने यात्रा वृत्तांतों में नालंदा की भव्यता का वर्णन किया है। ह्वेनसांग ने लिखा कि नालंदा में विशाल पुस्तकालय थे, जिन्हें ‘धर्मगंज’ कहा जाता था और इनमें लाखों पांडुलिपियां संग्रहीत थीं। लेकिन क्या ये पुस्तकालय केवल किताबों का भंडार थे या इनमें कुछ ऐसी गुप्त जानकारियां थीं, जो आज तक खोजी नहीं जा सकीं?
गुप्त पांडुलिपियों का रहस्यः नालंदा के पुस्तकालय में तीन प्रमुख भवन थे- रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक। इनमें से रत्नसागर को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था। कहा जाता है कि इन पुस्तकालयों में ऐसी पांडुलिपियां थीं, जो प्राचीन विज्ञान, ज्योतिष, और तंत्र-मंत्र से संबंधित थीं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इनमें से कुछ पांडुलिपियां ऐसी थीं, जिनमें उन्नत गणितीय और वैज्ञानिक सूत्र थे, जो आधुनिक विज्ञान के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते थे। लेकिन 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के दौरान इन पुस्तकालयों को आग के हवाले कर दिया गया। माना जाता है कि पुस्तकालय में आग इतनी भयंकर थी कि यह महीनों तक जलती रही। सवाल यह है कि क्या सभी पांडुलिपियां नष्ट हो गईं, या कुछ को गुप्त रूप से कहीं और ले जाया गया?
नालंदा का भूमिगत कक्ष रहस्यः पुरातत्वविदों ने नालंदा के खंडहरों में कुछ ऐसी संरचनाएं खोजी हैं, जो भूमिगत कक्षों की ओर इशारा करती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये कक्ष गुप्त शिक्षाओं या महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए थे। लेकिन इन कक्षों में क्या था? क्या ये केवल भंडारण के लिए थे, या इनमें कोई गुप्त मंदिर या ध्यान कक्ष थे? कुछ किंवदंतियों के अनुसार, नालंदा में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गुप्त साधनाएं की जाती थीं, जिनका ज्ञान केवल चुनिंदा लोगों को दिया जाता था। इन कक्षों की खोज आज भी अधूरी है, और पुरातत्वविदों को इसमें और गहराई से खुदाई करने की आवश्यकता है।
नालंदा का खोया हुआ खगोलीय ज्ञान रहस्य: नालंदा में खगोलशास्त्र और गणित के क्षेत्र में अग्रणी अनुसंधान होता था। प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट का संबंध भी नालंदा से जोड़ा जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि नालंदा में सूर्य, चंद्र और ग्रहों की गति के बारे में ऐसी गणनाएं थीं, जो आधुनिक खगोलशास्त्र के समकक्ष थीं। लेकिन इन गणनाओं का अधिकांश हिस्सा आज लुप्त है। क्या ये गणनाएं उन पांडुलिपियों का हिस्सा थीं, जो आग में नष्ट हो गईं? या फिर इन्हें किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया गया था, जैसे कि तिब्बत के मठों में, जहां बौद्ध ग्रंथों को सुरक्षित रखा गया था?
बख्तियार खिलजी का आक्रमण रहस्य: 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में नालंदा पर हमला हुआ, जिसने इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया। लेकिन इस हमले के पीछे की वजहें आज भी स्पष्ट नहीं हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि नालंदा के विशाल ज्ञान भंडार को नष्ट करने की एक सुनियोजित साजिश थी। क्या खिलजी को नालंदा के गुप्त ज्ञान के बारे में पता था? क्या वह इसे पूरी तरह मिटाना चाहता था ताकि यह ज्ञान किसी और के हाथ न लगे? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया है।
नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्जननः बता दें किन 2014 में नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जनन के रूप में फिर से स्थापित किया गया। यह आधुनिक विश्वविद्यालय प्राचीन नालंदा की विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन पुरातत्वविदों और इतिहासकारों का मानना है कि नालंदा के खंडहरों में अभी भी कई रहस्य दबे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने नालंदा के उत्खनन में कई महत्वपूर्ण खोजें की हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है।
नालंदा विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी जगह थी, जहां मानवता का ज्ञान संरक्षित और विकसित किया जाता था। इसके अनसुलझे रहस्य- गुप्त पांडुलिपियां, भूमिगत कक्ष, खगोलीय ज्ञान और खिलजी के आक्रमण का उद्देश्य- आज भी हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। क्या ये रहस्य कभी उजागर होंगे? क्या नालंदा का खोया हुआ ज्ञान फिर से विश्व के सामने आएगा? ये सवाल न केवल इतिहासकारों के लिए, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो प्राचीन भारत की इस अनमोल धरोहर को समझना चाहता है।








