सीएम नीतीश कुमार के 17 वर्षीय विकास का आयना है यह पुल

नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पिछले 4 चुनाव से चहेते जदयू प्रत्याशी कौशलेन्द्र कुमार फिर चुनाव मैदान में विकास की नाव पर सवार है। लेकिन उन्हे शायद यह पता नहीं है कि उनके विकास में कितने छेद हैं। दर्जनों गांव में वोट वहिष्कार और मतदाताओं के बीच चुनाव को लेकर खास दिलचस्पी न होना गंभीर संकेत दे रहे हैं।

आसन्न लोकसभा चुनाव-2024 के बीच नालंदा जिले के बिंद प्रखंड से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। खबर है कि ननौर गांव के पास नोनिया नदी पर लाखों की लागत से 20 साल पहले यह पुल बना था। लेकिन, दोनों तरफ बनी सड़क से इसे अबतक जोड़ा नहीं जा सका है। संपर्क सड़क नहीं बनने से यह पुल तब से शोभा की वस्तु बनी हुई है। इससे किसानों के साथ एक बड़ी ग्रामीण आबादी की परेशानी बनी हुई है।

ताजा हाल यह है कि नोनिया नदी में पानी आने पर दर्जन भर गांवों के 25 हजार से अधिक की आबादी को आठ के बजाय 20 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। महज 400 मीटर संपर्क पथ नहीं होने से यहां के लोगों को 12 किलोमीटर अधिक दूरी तय करना पड़ता है।

जबकि, यह पुल नालंदा व शेखपुरा जिलों की सड़कों को जोड़ता है। यहां के लोग जनप्रतिनिधि से लेकर अधिकारियों तक से कई बार एप्रोच पथ बनाने की मांग कर चुके हैं। बावजूद, अब तक संपर्क पथ नहीं बन सका है।

पूर्व विधायक सतीश कुमार की अनुशंसा पर बना था यह पुलः ग्रामीणों के अनुसार दो दशक पहले पूर्व विधायक सतीश कुमार की अनुशंसा पर बिंद के जखौर मोड़ से ननौर, तेउस गांव होते हुए बरबीघा को जोड़ने वाली इस सड़क में ननौर गांव के पास नोनिया नदी में पुल बनाया गया था।

पुल तो बनकर तैयार हो गया। लेकिन, महज 400 मीटर संपर्क पथ को 20 सालों में भी नहीं जोड़ा जा सका है। जबकि, नदी के दोनों तरफ वाली सड़क चालू है। यह सड़क नालंदा को शेखपुरा जिला के कई गांवों को जोड़ती है।

संपर्क सड़क बनने से बरबीघा की 12 किमी दूरी हो जाती कमः इस सड़क के चालू होने से इब्राहिमपुर, खानपुर छत्तरबिगहा, जखौर, रसलपुर, सदरपुर समेत आसपास के दर्जनों गांव के लोगों को बरबीघा बाजार जाने में आसानी होगी।

इस पुल से होते हुए वहां जाने पर 12 किलोमीटर दूरी कम हो जाएगी। ननौर गांव से बरबीघा बाजार की दूरी महज आठ किलोमीटर रह जाएगी। जबकि, बरसात के दिनों में यहां के लोगों को बरबीघा बाजार जाने के लिए बेनार मोड़ होते हुए 20 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। क्योंकि, नदी में थोड़ा पानी आने के बाद ही उसपार जाना बंद हो जाता है।

रोजी रोजगार भी एक दूसरे पर आश्रितः ग्रामीण बताते हैं कि पुल के पास दोनों तरफ के गांवों के लोगों में बेटी-रोटी का संबंध है। उनके परिजन नदी के दोनों तरफ वाले गांवों में रहते हैं। साथ ही रोजी रोजगार के लिए भी वे एक दूसरे पर आश्रित है। कई सालों से नदियों में पानी नहीं आ रहा है।

तीन साल पहले बाढ़ आयी थी। तब बाढ़ ने विभीषिका मचायी थी। उस समय पुल के दोनों तरफ के गांवों का संपर्क खत्म हो गया था। महज 400 मीटर एप्रोच पथ इस इलाके के लोगों के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है। इसकी अनदेखी किए जाने से ग्रामीणों में काफी आक्रोश पनप रहा है। संपर्क पथ नहीं बनने से इस पुल की अहमियत ही खत्म है।

दोनों तरफ किसानों की खेतीबाड़ीः सबसे अधिक मुश्किल किसानों को होती है। कई किसान नदी के दोनों तरफ ही खेतीबाड़ी करते हैं। बारिश के दिनों में तीन माह तक इधर-उधर जाना लगभग बंद हो जाता है। इस कारण खेती प्रभावित होती है। कई बार समय पर खाद पानी तक नहीं दे पाते हैं। नदी में अधिक पानी आने पर उसपार जाना भी मुश्किल हो जाता है।

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नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके। More »

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