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    Sunday, July 21, 2024
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      नालंदा के चंडी में 38 साल पूर्व पहली बार यूं हुई थी ईवीएम से वोटिंग

      सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद 1984 में चुनाव आयोग ने ईवीएम के उपयोग को रोक दिया। इसे 1992 में संसद की मंजूरी मिलने के बाद फिर चालू किया गया..

      नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार में दूसरे चरण का मतदान शुरू हो चुका है। सभी मतदान केन्द्रों पर ईवीएम से वोटिंग कराई जा रही है। 1998 से लोकसभा और विधानसभा चुनाव ईवीएम से कराया जा रहा है।

      लेकिन सबसे पहले ईवीएम से वोटिंग की शुरूआत 38 साल पहले केरल के एर्नाकुलम के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में हुआ था। 19 मई, 1982 को परवूर के  84 मतदान केंद्रों में से 50 पर ईवीएम के जरिए मतदान कराया गया। ईवीएम से मतदान की पहली शुरुआत यहीं से हुई।

      केरल के एर्नाकुलम के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में ईवीएम से मतदान के बाद बिहार के चंडी विधानसभा क्षेत्र में पहली बार ईवीएम का प्रयोग किया गया था। नालंदा के चंडी विधानसभा क्षेत्र में 1983 में पहली बार उपचुनाव के दौरान ईवीएम मशीन का प्रयोग किया गया था।electronic voting machine evm 1

      नालंदा के चंडी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक और शिक्षा मंत्री रहें डॉ रामराज सिंह वर्ष 1980 में पांचवीं बार जीत दर्ज की। लेकिन 4 दिसम्बंर,1982 को उनका देहान्त हो गया।

      उनके निधन के बाद उपचुनाव की घोषणा की गई। उप चुनाव में डा रामराज सिंह के पुत्र अनिल कुमार कांग्रेस से उम्मीदवार बनाए गए थे। उनके सामने वर्ष  1977 में पहली बार जीतकर आए हरिनारायण सिंह थे।

      चुनाव आयोग ने चंडी विधानसभा क्षेत्र चुनाव के लिए सारी तैयारी पूरी कर ली थी। चुनाव आयोग ने परवूर निर्वाचन क्षेत्र की तरह यहां भी ईवीएम से मतदान प्रक्रिया का प्रयोग किया।

      उसने बैलेट पेपर के साथ चंडी विधानसभा क्षेत्र में लगभग 50 मतदान केंद्रों पर ईवीएम के माध्यम से मतदान कराया। चंडी के मतदाताओं ने पहली बार ईवीएम मशीन को देखा था, उनमें ईवीएम मशीन को लेकर कौतूहल था। इससे मतदान प्रक्रिया भी आसान हो गई थी और मतों की गिनती बैलेट पेपर से जल्दी ही हो गया।

      चुनाव आयोग ने चंडी विधानसभा चुनाव में दूसरी बार ईवीएम का प्रयोग करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 1984 में ईवीएम से मतदान पर रोक लगा दी।

      जिस तरह से ईवीएम से मतदान को लेकर सवाल खड़े होते रहते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। ईवीएम उस समय भी संदेह के घेरे में था, जब इसका पहला प्रयोग केरल के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में 38साल पहले हुआ था।

      दरअसल, एर्नाकुलम के उस चुनाव में ईवीएम का पहला ट्रायल किया गया था। हालांकि इसके लिए कोई संसदीय स्वीकृति नहीं ली गई थी। फिर भी एर्नाकुलम के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में 19 मई, 1982 को 84 बूथों में से 50 पर ईवीएम के जरिये मतदान कराए गए थे।

      इसका फायदा यह हुआ कि बैलेट पेपर वाले बूथों के बजाए ईवीएम वाले बूथों पर जल्दी मतदान समाप्त हो गया और बैलेट पेपर के मुकाबले ईवीएम वाले बूथों की गिनती भी जल्दी पूरी हो गई।

      वोटों की गिनती के बाद CPI के सिवन पिल्लई को इस सीट पर 30,450 वोट मिले थे।वहीं कांग्रेस की ओर से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एसी जोस को 30,327 मत मिले थे। जिसके हिसाब से मात्र 123 मतों से सिवन पिल्लई ने एसी जोस को हरा दिया था।

      कांग्रेस उम्मीदवार ने हार मानने से इनकार कर दिया। उसने ईवीएम की तकनीकी पर ही सवाल खड़ा कर दिया। जोस ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि बिना संसदीय स्वीकृति के ईवीएम का इस्तेमाल हुआ है, जो सही नहीं है।

      जोस ने जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 और चुनाव अधिनियम, 1961 का हवाला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद जब जोस सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो फैसला उनके पक्ष में आया।

      जिन 50 बूथों पर ईवीएम से वोटिंग हुई थी, वहां सुप्रीम कोर्ट ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने का आदेश दिया। इसके बाद हुई मतगणना में जोस को 2000 वोट ज्यादा मिले।

      इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के नए प्रयोग चुनाव के दौरान किए जाने पर रोक लगा दी।

      सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद 1984 में चुनाव आयोग ने ईवीएम के उपयोग को रोक दिया। इसे 1992 में संसद की मंजूरी मिलने के बाद फिर चालू किया गया।

      वर्ष 1998 के बाद से लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में ईवीएम का उपयोग किया जाने लगा।

      हाल में ईवीएम पर फिर सवाल उठे तो चुनाव आयोग ने वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) मशीनों के प्रयोग की बात शुरू की ताकि पारदर्शिता बनाई जा सके।

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