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56 साल बाद सावन-भादो की बेरुखी से खेतों में पड़ी दरारें, किसान हलकान

बेन (रामावतार कुमार)। सावन भादो के महीने में इस कदर गर्मी और सूखे पड़े खेतों में दरारें 1966 की अकाल जैसे हालात जैसे बने हैं। हल्की फुहार के बीच आषाढ़ और सावन बगैर बारिश के हीं गुजर गया। भादो महीने का भी एक पखवाड़े का वक्त गुजर चुका है। लेकिन अबतक झमाझम बारिश की किसानों की आस पूरी नहीं हो सकी है।

किसानों की मानें तो अगर यही स्थिति कायम रही तो 1966 के अकाल से भी बदतर होगी। करीब 56 साल बाद सावन-भादो सूखा पड़ रहा है। किसान रामनरेश प्रसाद, रमाशंकर सिंह, त्रिभुवन सिंह, रामदेव प्रसाद का कहना है कि सावन भादो के महीने में ऐसा मौसम पहली बार देखने को मिल रहा है।

★ 1966 को याद कर सहमे किसान: पूरे देश में 1966 में अकाल पड़ा था। पुराने जमाने के लोग कहते हैं कि अकाल के समय में भी धान की रोपनी हो चुकी थी और धान की बाली निकलने वाली थी। भादो महीने के अंत में सूखा पड़ा था।

उस समय भी आषाढ़ सावन में हल्की बारिश हुई थी। संसाधन का अभाव था। इस बार अब तक के हालात भी चिंताजनक है। खेतों में दरारें पड़ गई है। ऐसे में 1966 के याद से लोगों का मन सिहर जा रहा है।

★ प्रकृति का दोहन पड़ रहा भारी: काफी वयोवृद्ध किसान श्यामनारायण प्रसाद कहते हैं कि पूरी अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर है। प्रकृति का अवैध दोहन पर्यावरण पर भारी पडध रहा है। जिससे बरसात पर ब्रेक लग रहा है। और जलस्तर पाताल जा रहा है।

आज से दो दशक पूर्व खूब बरसात होती थी। और जलस्तर काफी ऊपर था। परंतु जैसे जैसे पेड़-पौधे और जंगल कट रहे हैं बरसात पर ब्रेक लग रही है। जलस्तर पाताल जा रहा है। बेहिसाब पानी का दोहन हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे हीं हालात रहे तो अन्न के साथ साथ जलसंकट भी हो सकता है।

Nalanda Darpan

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