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      हरनौत-राजगीर-अस्थावां-बिहार शरीफ-हिलसा-इसलामपुर-नालंदाः किसी का चुनाव आसान नहीं

      नालंदा के सभी सात विधानसभा क्षेत्र सीएम नीतीश कुमार के लिए प्रतिष्ठा का सीट माना जाता है। यहां 3 नबबंर को वोट डाले जाएंगे। मतदाताओं के मन में जहां जातीय अभिमान है तो दूसरी तरफ बदलाव की छटपटाहट भी दिख रही है। वैसे भी नालंदा में मतदाता अपने वोट का फैसला अंतिम समय में करता आया है...

      नालंदा दर्पण डेस्क (जयप्रकाश नवीन / मुकेश भारतीय)। वेशक बिहार में चुनाव महज जाति का खेल है और कुछ नहीं। इसकी सच्चाई परखनी हो तो नालंदा चले आईए। यहां जाति और जाति के मान, अभिमान और तथाकथित स्वाभिमान के सामने सारे मुद्दे इस कदर फिसल जाते है,जैसे बंद मुट्ठी से रेत।

      ज्ञान की धरती नालंदा निवर्तमान मुख्यमंत्री की जदयू का अभेद्य किला माना जाता है। जिसे पिछले ढाई दशक से भेदना अन्य राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं रहा है।

      लेकिन बदले राजनीतिक समीकरण और सीएम नीतीश के डेढ़ दशक के शासन को ब्रेक लगाने की कोशिश में नालंदा के मतदाता भी लगे हुए हैं।

      सीएम नीतीश को ढ़ाई दशक बाद अपने ही दुर्ग में चुनौती मिलती दिख रही है। नालंदा के साथ कई विधानसभा क्षेत्र में एनडीए को अपने ही ‘बागी’नेताओं से खतरा दिख रहा है।

      नालंदा के सबसे प्रतिष्ठित नालंदा और हरनौत में एनडीए के बागी उम्मीदवार सीएम नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा को धूमिल करने में लगे हुए हैं।

      राजगीर में भी वहीं हाल है। यहां जदयू के निवर्तमान विधायक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में खड़े हो गये हैं। जिन्हें कांग्रेस कार्यकर्ताओं का ही साथ मिलता नहीं दिख रहा है।

      लेकिन जिस तरह से भाजपा के दिग्गज संप्रति हरियाणा के महामहिम एसएन आर्या के पुत्र को जदयू से चुनाव मैदान में उतारा है, वह रवि ज्योति को संजीवनी का काम करता दिख रहा है।

      बता दें कि जदयू सुप्रीमों नीतीश कुमार ने राजगीर के कांग्रेस प्रत्याशी को लेकर अपनी जनसभा में अप्रत्याशित टिप्पणी की है। नीतीश ने अपने बहके अंदाज में यहां तक दो टूक कह डाला कि ‘चुनाव के बाद वहीं भेज दिए जाएंगें, जहां वे (रवि ज्योति) पैदा पैदा हुए हैं।’

      जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में भी भाजपा के दिग्गज डॉ सुनील कुमार की कुर्सी भी खतरे में दिख रही है। यहां इस बार राजद के सुनील कुमार से कड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। यहां दोनों गठबंधन के उम्मीदवारों की हार-जीत के फैसले में कई अन्य दलों के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका काफी अहम होगी।

      अस्थावां: नालंदा का अस्थावां का अपना इतिहास रहा है। मुगलकालीन शासन की विरासत यहां बिखरी हुई है। प्रशासक-राजनीतिज्ञ पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा का पैतृक गांव अस्थावां विधानसभा क्षेत्र में ही है।

      यहां कुल 19 उम्मीदवार चुनाव मैदान में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। वर्ष 2005 से यहां से जितेंद्र कुमार विधायक हैं। वे पांचवीं बार चुनाव मैदान में हैं।

      हालांकि जदयू के अंदर उनका विरोध होता रहा है। फिर भी पार्टी ने उनपर फिर से भरोसा जताते हुए चुनाव मैदान में उतारा है।

      लेकिन जदयू के बागी बिपिन चौधरी निर्दलीय मैदान में उतरकर जदयू की मुश्किल बढ़ा दी है। वहीं, एक अन्य बागी अनिल कुमार को राजद ने टिकट देकर निवर्तमान विधायक को घेरने में लगी हुई है।

      वहीं लोजपा ने भी मैदान में अपने उम्मीदवार उतारे हैं। लोजपा के रमेश कुमार भी अपने पार्टी के आधार वोट पर ताल ठोक रहे हैं।

      बिहारशरीफ: जिला मुख्यालय बिहारशरीफ विधानसभा क्षेत्र भी अपने आप में ऐतिहासिकता समेटे हुए है। बिहारशरीफ में शेख शफीदुदीन याहिया मनेरी की मजार और मलिक बयां की मजार प्रसिद्ध है।

      मणिराम अखाड़ा और कई धार्मिक स्थलों में शुमार बिहारशरीफ शहर की अपनी भव्यता है। बदले हुए राजनीतिक समीकरण में यहां भी मतदाताओं में वर्तमान विधायक के प्रति गुस्सा साफ दिख रहा है।

      भाजपा के सुनील कुमार चौथी बार चुनाव मैदान में क़िस्मत आजमा रहे हैं। पिछली बार भाजपा ने एकमात्र बिहारशरीफ सीट कब्जाने में कामयाब रही थी।

      इस बार एनडीए की ओर से भाजपा के सुनील कुमार की राह आसान नहीं दिख रही है। यहां महागठबंधन की ओर से राजद ने एक दूसरे सुनील कुमार को मैदान में उतारकर मुकाबला रोचक बना दिया है, जिनका बैकग्राउंड भाजपा के खास वोटर से साफ तौर पर जुड़ा रहा है।

      राजगीर: पंच पहाड़ियों से घिरी राजगीर मगध की राजधानी रह चुकी है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रुप में लोकप्रिय राजगीर विधानसभा क्षेत्र में एस एन आर्या‌ का दबादबा रहा है।

      लेकिन वर्ष 2015 में विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की ओर से जदयू उम्मीदवार के रूप में रवि ज्योति थे। जहां उन्होंने एस एन आर्या‌ के साम्राज्य को ध्वस्त करने में सफल रहे।

      लेकिन बदले राजनीतिक समीकरण में जदयू ने अपने निवर्तमान विधायक रवि ज्योति की जगह एस एन आर्या‌ के पुत्र कौशल किशोर को टिकट दे दिया। उसके बाद रवि ज्योति ने पार्टी से बगाबत करते हुए कांग्रेस से चुनावी दंगल में है।

      राजगीर में भी एनडीए को बागी उम्मीदवार का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा की जिला मंत्री मुखिया मंजू देवी बगाबत कर एनडीए का खेल बिगाड़ने में लगी हुई है। लोजपा की टिकट पर वह चुनाव मैदान में हैं।

      वहीं, राजगीर में इस बार जनता दल (सेक्युलर) से अमित पासवान भी काफी मेहनत करते दिख रहे हैं। सच पुछिए तो यहां इस बार एनडीए और महागठबंधन प्रत्याशी के जीत-हार के बीच वे साफ तौर पर खड़े नजर आते हैं।

      ऐसे में चर्तुकोणीय मुकाबले में फंसे राजगीर में ऊंट किस करवट बैठेगा, अंतिम नतीजे आने तक इंतजार करना पड़ेगा।

      इसलामपुर: जदयू ने अपने निवर्तमान विधायक चंद्रसेन कुमार को फिर से चुनाव मैदान में उतारा है। पिछली बार उन्होंने भाजपा के वीरेंद्र कुमार को हराया था।

      वहीं महागठबंधन की ओर से राजद ने राकेश कुमार रौशन को टिकट देकर इस्लामपुर की लड़ाई को कड़े मुकाबले में ला दिया है।

      वहीं लोजपा से नरेश प्रसाद सिंह मुकाबले को त्रिकोणीय मोड़ रहे हैं। उन्हें भी अपने स्वजातीय वोटरों पर भरोसा दिख रहा है। यहां चुनाव मैदान में कुल 17 उम्मीदवार क़िस्मत आजमा रहे हैं।

      हिलसा:  हिलसा में फिर से महागठबंधन उम्मीदवार के रूप में अत्रिमुनि उर्फ शक्ति यादव फिर से चुनाव मैदान में हैं।

      पिछली बार जदयू साथ थी। लेकिन इस बार जदयू ने नये चेहरे के रुप में कृष्ण मुरारी शरण उर्फ प्रेम मुखिया को उम्मीदवार मैदान में उतारा है।

      वहीं लोजपा की ओर से डा कुमार सुमन सिंह और जाप से राजू दानवीर को मैदान में हैं। जदयू को तीनों से कड़ी टक्कर मिल रही है।

      इस चतुष्कोणीय मुकाबले को मतदाता किस रूप में देख रहे हैं, कहना मुश्किल है। यहां कुल 19 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं।

      नालंदा:  सीएम नीतीश कुमार के लिए नालंदा विधानसभा क्षेत्र प्रतिष्ठा का बिषय बना हुआ है।

      पिछले ढ़ाई दशक से नालंदा विधानसभा क्षेत्र से प्रतिनिधित्व कर रहे मंत्री श्रवण कुमार कभी सीएम नीतीश कुमार के मैनेजर के रूप में जाने जाते थे। पिछले चुनाव में उन्हें बीजेपी के कौशलेंद्र कुमार से कड़ी टक्कर मिली थी।

      इस बार फिर से बीजेपी के बागी कौशलेंद्र कुमार उर्फ छोटे मुखिया निर्दलीय चुनाव मैदान में श्रवण कुमार के खिलाफ ताल ठोक उन्हें कड़ी चुनौती देते दिख रहे हैं।

      हालांकि महागठबंधन से कांग्रेस ने गुंजन पटेल को मैदान में उतारा है। वहीं लोजपा की ओर से रामकेश्वर उर्फ पप्पू और रालोसपा ने सोनू कुशवाहा को मैदान में उतारा है। श्रवण कुमार को चुनौती देने के अपने-अपने अलग दावे हैं।

      हरनौत:   यह विधानसभा सीएम नीतीश कुमार का पैतृक क्षेत्र माना जाता है। इसी हरनौत के कल्याण बिगहा की पगडंडियों से निकलकर उन्होंने सियासत में यह बुलंद मुकाम हासिल की। 15 साल से बिहार की कुर्सी पर विराजमान हैं।

      सीएम नीतीश कुमार का गृह विधानसभा क्षेत्र में जदयू के ही बागी जदयू उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने में लगे हुए हैं।

      सीएम नीतीश कुमार के लिए हरनौत हृदय माना जाता है। सीएम नीतीश कुमार स्वंय यहां से 1985 और 1995 में विधायक रह चुके हैं।

      इस बार जदयू से निर्वतमान विधायक हरिनारायण सिंह तीसरी बार चुनाव मैदान में हैं। हालांकि इस बार जदयू के अंदर से प्रत्याशी बदलने की मांग उठती रही। टिकट के कई दावेदार भी सामने आए।

      लेकिन सीएम नीतीश कुमार ने फिर से हरिनारायण सिंह पर आस्था दिखाते हुए मैदान में उतार दिया। जिस कारण जदयू को बागी नेताओं का गुस्सा झेलना पड़ रहा है।

      टिकट के प्रमुख दावेदार में शामिल मुखिया ममता देवी बागी हो गई। उन्होंने लोजपा का दामन थाम लिया। वे लोजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हरिनारायण सिंह को कड़ी टक्कर देती दिख रही है।

      हालांकि चंडी में निर्वतमान विधायक के खिलाफ आक्रोश दिख रहा है। उनके स्वजातीय वोटर ही बागी बने हुए हैं। उनका रूझान लोजपा प्रत्याशी के पक्ष में जाता दिख रहा है।

      हालांकि, हरनौत के चंडी (विलोपित विधानसभा) हलके में पिछले दो दशक से यह भी देखा जाता रहा है कि जदयू से जुड़े एक ‘जाति’ के विशेष ‘उप जाति’ में उपजे आक्रोश अंततः मतदान के ठीक पहले नीतीश को लेकर नरम पड़ जाते रहे हैं और नतीजे वहीं ढाक के तीन पात।

      पिछले दो चुनावों से बागी बने जदयू नेता ई अशोक कुमार सिंह भी निर्दलीय भाग्य आजमा रहे हैं। हरनौत में कुल 24 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।

      ऐसे में यहां देखना काफी दिलचस्प होगा कि निवर्तमान विधायक को आठवीं बार विधानसभा पहुंचने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। क्योंकि इस बार उनकी राह कठिन नजर आ रही है।

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