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    अब ‘बिहारी बाबू’ के पूर्वजों के पैतृक पंचायत सरथा का हरनौत में यूं हुआ विलय

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    “और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे

    कारवां गुज़र गया,गुबार देखते रहे,नींद भी खुली न थी

    कि हाय धूप ढल गई,पांव जब तलक उठे कि जिंदगी फिसल गई….”

    नालंदा दर्पण डेस्क।  गोपाल दास ‘नीरज’ की यह पंक्तियां चंडी प्रखंड की जनता की नियति रही है। एक बार फिर से चंडी की जनता और यहां के महान नेताओं और समाजसेवियों की अपार संख्या के बाबजूद उनकी संवेदनहीनता सामने आई है।

    चंडी प्रखंड को एक बार फिर से परिसीमन का सामना करना पड़ा है। चंडी एक बार फिर से राजनीतिक साज़िश का शिकार बन गया। पहले थरथरी और नगरनौसा कटा  फिर  विधानसभा का विलोपन और अब  ‘बिहारी बाबू’ के पैतृक पंचायत सरथा का हरनौत प्रखंड में विलय।

    वहीं चंडी प्रखंड की हृदय स्थली नरसंढा को चंडी से हटाने की मुहिम चल रही है। नरसंढा को अलग प्रखंड बनाने की मांग सीएम के पास प्रस्तावित है। अगर नरसंढ़ा प्रखंड बना तो चंडी नालंदा का एक छोटा सा प्रखंड बनकर रह जाएगा और भविष्य में वह किसी भी दावेदारी के लिए पंगू बनकर रह जाएगा।

    चंडी प्रखंड का सरथा पंचायत का विलय आखिरकार हरनौत में हो ही गया। 15 पंचायतों वाले चंडी प्रखंड में अब महज 14 पंचायत ही रह गये है। वहीं चंडी को नगर पंचायत का दर्जा मिलने के बाद से दो और अलग नये पंचायत का निर्माण होना या विलय होना है।

    चंडी के सरथा पंचायत को हरनौत में मिलाने की मुहिम वर्षों से चल रही थी। 26 फरवरी को हरनौत में पंचायत समिति की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सरथा को हरनौत में शामिल करने का निर्णय लिया गया था।

    इसके बाद जिला प्रशासन ने 24 मार्च को सरकार के पास प्रस्ताव भेजा।जिस पर त्वरित निर्णय लेते हुए ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव ने इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी।जिसके बाद से सरथा अब हरनौत का 18वां पंचायत होगा।

    साथ ही हरनौत वासियों को लंबे समय बाद अपने संघर्ष का नतीजा मिला। हरनौत के लोग आरंभ से ही सरथा को अपने प्रखंड में शामिल करने की मांग कर रहे थे।

    उनका कहना था कि सरथा के लोगों को चंडी प्रखंड मुख्यालय जाने में 20 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। जबकि यहां से हरनौत मुख्यालय की दूरी दो किलोमीटर ही है। सरथा पंचायत के विलय के बाद हरनौत की आबादी में दस हजार बढ़ जाएगी।

    बताते चलें कि परिसीमन आयोग ने भी हरनौत की आबादी ज्यादा रहने की वजह से चंडी विधानसभा को विलोपित कर हरनौत में शामिल कर दिया था।

    अब हरनौत की आबादी अब 1लाख 86 हजार से ज्यादा हो गई है। ऐसे में भविष्य में वह अनुमंडल का दावेदार हो गई है।

    दूसरे तरफ चंडी अंचल के सामने तीसरी बार टुकड़े होने की तलवार लटक रही है। थरथरी और नगरनौसा के बाद नरसंढ़ा भी जल्द प्रखंड बनने की लाइन में है। अगर ऐसा हुआ तो हरनौत जहां ज्यादा मजबूत होगा वहीं चंडी और कमजोर।

    सरथा पंचायत के सभी गांव बहादुरपुर, गंगाविगहा, टांडपर आदि अपने प्रखंड चंडी के बजाय उनका नया पता हरनौत होगा। फिलहाल सरथा को हरनौत में विलय किये जाने पर दोनों जगह खुशी देखी जा रही है।

    ‘बिहारी बाबू’ शत्रुघ्न सिन्हा का पैतृक पंचायत रहा है सरथा

    चंडी प्रखंड का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। देश की प्रथम केंद्रीय वित राज्य मंत्री रही तारकेश्वरी सिन्हा भी चंडी की ही थी। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि ‘बिहारी बाबू’ और ‘शॉटगन’ के नाम से मशहूर सिने स्टार और राजनीतिज्ञ शत्रुघ्न सिन्हा के पूर्वज भी चंडी के सरथा पंचायत के बहादुर पुर गांव के बाशिंदे थे।

    हालांकि शत्रुघ्न सिन्हा के जन्म के काफी साल पहले ही इनके पिता डॉ भुवनेश्वरी प्रसाद सिन्हा पैतृक गांव बहादुरपुर से नाता तोड़कर पटना आ गए थे। शत्रुघ्न सिन्हा के अपने और चचेरे दादा बहादुरपुर के ही थे।

    बिहारी बाबू के चचेरे दादा अंग्रेजों के जमाने के जज थे। गांव में आज भी इनके चचेरे चाचाओं की पैतृक जमीन है।

    कहा जाता है कि जब डॉ भुवनेश्वरी प्रसाद सिन्हा को संतान नहीं हो रही थी तो वे अपनी पत्नी श्यामा सिन्हा के साथ बनारस जाकर पूजा पाठ की। तब जाकर उन्हें चार संतान हुई। जिनमें शत्रुघ्न सिन्हा सबसे छोटे हैं।

    इनके बड़े भाई राम सिन्हा अमेरिका में वैज्ञानिक रह चुके हैं। तो लखन सिन्हा मुंबई में रहते हैं। भरत सिन्हा डॉक्टर हैं, जो इंग्लैंड में रहते हैं। इनकी बहू इंग्लैंड के जाने-माने उद्योगपति परिवार से ताल्लुक रखती हैं।

    फिलहाल, सरथा अब चंडी का अतीत बन गया है। साथ ही एक गौरवशाली अतीत  धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। आनेवाली पीढ़ी को अपने धरोहर से अंजान रहना पड़ेगा।

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