बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले में खरीफ विपणन मौसम 2024-25 के दौरान धान की खरीद में पैक्सों और व्यापार मंडलों ने भले ही उत्साह दिखाया, लेकिन अब कस्टम मिल्ड राइस (सीएमआर) जमा कराने में उनकी ढिलाई सामने आ रही है।
जिला प्रशासन ने इस लापरवाही को गंभीरता से लिया है और पैक्स अध्यक्षों को 5 अगस्त तक बकाया चावल जमा करने का अंतिम अल्टीमेटम दिया है। आखिर इस देरी का कारण क्या है, और इसका स्थानीय किसानों और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
खरीफ विपणन मौसम 2024-25 में नालंदा जिले के 203 पैक्सों और 15 व्यापार मंडलों ने 22,029 किसानों से 1,75,057 मेट्रिक टन धान की खरीद कर निर्धारित लक्ष्य को हासिल किया। यह एक बड़ी उपलब्धि थी, जो जिले की कृषि व्यवस्था की ताकत को दर्शाती है। लेकिन, इस धान को संसाधित कर सीएमआर (कस्टम मिल्ड राइस यानी मिल में संसाधित चावल) के रूप में जमा करने की प्रक्रिया में कई पैक्स पीछे रह गए हैं।
वर्तमान में जिले में लगभग 534 लॉट सीएमआर बकाया है। इसमें बेन प्रखंड के एकसारा और खैरा पैक्स, इस्लामपुर प्रखंड के केशोपुर और पंचलोवा पैक्स, अस्थावां प्रखंड के सभी पैक्स, सरमेरा के चेरो पैक्स, गिरियक के पोखरपुर पैक्स और सिलाव के नीरपुर पैक्स जैसे क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हैं।
जिला पदाधिकारी कुंदन कुमार ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। हाल ही में आयोजित एक बैठक में उन्होंने पैक्स अध्यक्षों, व्यापार मंडल प्रबंधकों और मिलरों को जल्द से जल्द बकाया सीएमआर जमा करने का निर्देश दिया। प्रशासन ने पहले भी कई बार समय सीमा बढ़ाई, लेकिन अब 5 अगस्त को अंतिम तिथि निर्धारित की गई है। इस तिथि के बाद लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
सीएमआर जमा करने में देरी के कई संभावित कारण हो सकते हैं। क्या यह संसाधनों की कमी, प्रबंधन में अक्षमता या अन्य प्रशासनिक बाधाओं का परिणाम है? स्थानीय किसानों का कहना है कि इस देरी से उनकी आय पर असर पड़ सकता है, क्योंकि समय पर भुगतान और वितरण में रुकावट आ रही है।
बहरहाल, प्रशासन ने पैक्सों को यह स्पष्ट कर दिया है कि समय सीमा का पालन न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। लेकिन क्या यह केवल सख्ती से हल होगा या पैक्सों को तकनीकी और वित्तीय सहायता की आवश्यकता है? यह सवाल जिले की कृषि व्यवस्था के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।









