अंचल कार्यालयों में दाखिल खारिज और जमाबंदी सुधार आम लोगों के लिए बड़ी चुनौती

बेन (नालंदा दर्पण)। सरकार द्वारा राजस्व संबंधी सेवाओं को पारदर्शी और आसान बनाने के उद्देश्य से दाखिल खारिज और जमाबंदी सुधार, वंशावली निर्माण समेत कई प्रक्रियाओं को ऑनलाइन कर दिया गया है। इसके बावजूद अंचल कार्यालयों में भ्रष्टाचार, दलाली और अनियमितताओं की शिकायतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। हालात ऐसे हैं कि बिना दलाल के किसी भी काम का समय पर होना आम लोगों के लिए अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
स्थानीय लोगों और सूत्रों की मानें तो अंचल कार्यालयों में हर छोटे-बड़े कार्य के लिए अलग-अलग रेट तय हैं। आवेदन ऑनलाइन होने के बाद भी फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए कथित रूप से चढ़ावा जरूरी माना जाता है। गरीब और सामान्य परिवार के लोग सबसे अधिक परेशान हो रहे हैं, जिन्हें सरकारी व्यवस्था से राहत मिलने के बजाय लगातार चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
ऑनलाइन व्यवस्था भी नहीं बनी राहतः राजस्व विभाग की ऑनलाइन प्रणाली का उद्देश्य था कि लोगों को कार्यालयों के अनावश्यक चक्कर न लगाने पड़ें, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट दिखाई दे रही है। कई मामलों में ऑनलाइन आवेदन के बाद भी आवेदकों से बार-बार अतिरिक्त कागजात मांगे जा रहे हैं। राजस्व कर्मचारियों से मुलाकात करना तक मुश्किल बताया जाता है।
एक मामले में जमीन खरीदने वाले व्यक्ति ने दाखिल-खारिज के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज जमा किए, लेकिन उससे विक्रेता के पुराने दस्तावेज तक मांगे गए। नतीजतन मामला तय समय सीमा से अधिक दिनों तक लंबित रहा। ऐसे कई मामलों में लोग मानसिक और आर्थिक रूप से परेशान हो रहे हैं।
जमीन विवादों में भी बढ़ रही परेशानीः जानकारों का कहना है कि कई भूमि विवाद मामलों में सुनवाई के दौरान कागजातों की गंभीरता से जांच नहीं की जाती। दोनों पक्षों की बातों को विस्तार से सुनने के बजाय जल्दबाजी में निर्णय लेने के आरोप लगते रहे हैं। परिणामस्वरूप जो मामले अंचल स्तर पर सुलझ सकते हैं, वे उपसमाहर्ता और अपर समाहर्ता न्यायालय तक पहुंच जाते हैं।
इससे एक ओर आम लोगों का समय और पैसा बर्बाद होता है, वहीं दूसरी ओर उच्च न्यायालयों पर अनावश्यक भार भी बढ़ता है।
दलालों के भरोसे चल रही व्यवस्था? अंचल कार्यालयों में दलालों की सक्रियता सबसे बड़ा सवाल बनती जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई हल्का कर्मचारियों का अस्थायी कार्यालय दलालों के ठिकानों पर ही चलता है। दाखिल-खारिज, रसीद कटवाने, जमाबंदी सुधार या अन्य राजस्व कार्यों के लिए लोग कर्मचारियों से अधिक दलालों से संपर्क करना आसान समझते हैं।
सूत्र बताते हैं कि लगभग हर राजस्व कर्मचारी के साथ एक-एक बिचौलिया सक्रिय रहता है, जो सरकारी कागजातों तक पहुंच बनाकर मोटी रकम की उगाही करता है। बेन अंचल में भी दो-तीन कथित बिचौलियों के प्रभाव की चर्चा जोरों पर है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सरकारी कागजातों तक बाहरी लोगों की पहुंच कैसे संभव हो रही है? यदि ऐसा हो रहा है तो क्या इसमें केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि कुछ अधिकारी भी शामिल हैं? प्रशासनिक स्तर पर समय-समय पर भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास जरूर किए जाते हैं, लेकिन कार्रवाई कुछ दिनों बाद ठंडी पड़ जाती है। यही वजह है कि व्यवस्था में सुधार के बजाय दलालों का नेटवर्क और मजबूत होता जा रहा है।
जनता की मांग, हो निष्पक्ष जांचः स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग से अंचल कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार और दलाली की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि ऑनलाइन व्यवस्था को सही तरीके से लागू किया जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, तभी आम जनता को राहत मिल सकती है।






