Friday, February 13, 2026
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    नालंदा विश्वविद्यालय: खाक से शुरू हुआ सफर चढ़ रहा शिखर की सीढ़ी

    नालंदा दर्पण डेस्क / मुकेश भारतीय। क्या आपने कभी सोचा है कि एक स्थान कैसे सदियों तक ज्ञान का प्रतीक बन सकता है? नालंदा विश्वविद्यालय का नाम संस्कृत के ‘नाल’ (ज्ञान) और ‘अंदा’ (देने वाला) से लिया गया है। यह प्राचीन भारत में शिक्षा और बौद्धिक उत्कृष्टता का पर्याय था।

    पांचवीं शताब्दी में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम द्वारा स्थापित यह विश्व का पहला पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। अपने चरम पर नालंदा में 10000 से अधिक छात्र और 2000 शिक्षक थे, जो भारत के साथ-साथ चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस और तुर्की जैसे देशों से आए थे। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि उस युग में जब यात्रा करना अपने आप में एक साहसिक कार्य था, नालंदा ने वैश्विक विद्वानों को आकर्षित किया?

    नालंदा केवल बौद्ध धर्म का केंद्र नहीं था। यहाँ व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, खगोलशास्त्र और दर्शन जैसे विविध विषय पढ़ाए जाते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के विवरण बताते हैं कि यहाँ की विशाल पुस्तकालय, जिसे ‘धर्मगंज’ कहा जाता था, उसमें लाखों ग्रंथ थे।

    क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उस समय के लिए यह कितना असाधारण था? नालंदा के मठों, स्तूपों और मंदिरों की भव्य वास्तुकला विशेष रूप से मंदिर संख्या तीन की पंचरत्न स्थापत्य कला, कंबोडिया के अंगकोर वाट से समानता रखती थी। यह विश्वविद्यालय न केवल शिक्षा का, बल्कि सांस्कृतिक और स्थापत्य नवाचार का भी प्रतीक था।

    लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गौरवशाली संस्थान को बार-बार आघात झेलने पड़े? 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण ने नालंदा को खाक में मिला दिया। पुस्तकालय की आग महीनों तक जलती रही। अनमोल ज्ञान को नष्ट कर दिया। इसी तरह तिलाधक और उदंतपुरी विश्वविद्यालय भी लुप्त हो गए। फिर भी नालंदा की आत्मा कभी नहीं मरी। क्या यह उसकी अटूट भावना का प्रमाण नहीं है कि आज सैकड़ों वर्षों बाद, यह फिर से उभर रहा है?

    क्या एक नष्ट हुए स्वप्न को फिर से जीवित किया जा सकता है? नालंदा विश्वविद्यालय इसका जीवंत उदाहरण है। 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पहल और 2007 के पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के समर्थन से नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना का सपना साकार हुआ।

    2010 में भारतीय संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित यह विश्वविद्यालय 2014 में राजगीर बिहार में अपने पहले शैक्षणिक सत्र के साथ शुरू हुआ। 19 जून 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके नए परिसर का उद्घाटन किया, जो प्राचीन नालंदा के खंडहरों के निकट है। क्या यह संयोग नहीं कि नालंदा एक बार फिर विश्व मंच पर अपनी पहचान बना रहा है?

    आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय न केवल अपने ऐतिहासिक गौरव को पुनर्जनन करता है, बल्कि 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी तैयार है। यह ‘नेट जीरो’ परिसर है, जो पर्यावरणीय स्थिरता का प्रतीक है। 6.5 मेगावाट सौर ऊर्जा संयंत्र, 40 हेक्टेयर में फैले जलाशय, जैविक अपशिष्ट और बायोगैस संयंत्र और जल पुनर्चक्रण संयंत्र इसे आत्मनिर्भर बनाते हैं।

    क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक प्राचीन संस्थान की आत्मा अब आधुनिक पर्यावरणीय मूल्यों के साथ जीवित है? परिसर में 2,000 दर्शकों की क्षमता वाला एम्फीथिएटर, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र और वातानुकूलित छात्रावास जैसी सुविधाएँ इसे वैश्विक स्तर का शैक्षणिक केंद्र बनाती हैं।

    नालंदा विश्वविद्यालय आज छह स्कूलों के माध्यम से ज्ञान का प्रसार कर रहा है। बौद्ध अध्ययन, ऐतिहासिक अध्ययन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण अध्ययन, भाषा और साहित्य, प्रबंधन अध्ययन, और अंतर्राष्ट्रीय संबंध और शांति अध्ययन। इसके अतिरिक्त ‘वे ऑफ बांगला स्टडीज’, ‘इंडो-पार्सियन स्टडीज’ और ‘कॉमन अर्कावल एंड कन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन’ जैसे अनुसंधान केंद्र इसे अनूठा बनाते हैं।

    क्या यह रोचक नहीं कि नालंदा आज भी वैश्विक चिंताओं जैसे पर्यावरण और शांति को अपनी पढ़ाई का हिस्सा बना रहा है?

    विश्वविद्यालय ने वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए 20 से अधिक समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें स्पेन के सलामांका विश्वविद्यालय, श्रीलंका के केलानिया विश्वविद्यालय, थाईलैंड के चुलालोंगकोर्न विश्वविद्यालय, दक्षिण कोरिया के डोंग विश्वविद्यालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जैसे संस्थान शामिल हैं।

    इसके अलावा एशियन इंडिया नेटवर्क और यूनिवर्सिटीज के साथ सहयोग, जैसे आईआईटी कानपुर, रूड़की, और मलेशिया के मलाया विश्वविद्यालय नालंदा को वैश्विक शैक्षणिक समुदाय का हिस्सा बनाते हैं। क्या यह नालंदा की प्राचीन वैश्विकता का आधुनिक रूप नहीं है?

    नालंदा आज केवल प्राचीन विश्वविद्यालय की छाया नहीं है। यह एक बहुआयामी शैक्षणिक केंद्र बन चुका है। नव नालंदा महाविहार पाली साहित्य और बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए समर्पित है, जबकि नालंदा खुला विश्वविद्यालय और खेल विश्वविद्यालय शिक्षा और खेल के क्षेत्र में नई संभावनाएँ खोल रहे हैं।

    क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि एक ही क्षेत्र में चार विश्वविद्यालय ज्ञान के विभिन्न आयामों को समेटे हुए हैं? खेल विश्वविद्यालय, विशेष रूप से नालंदा को खेल शिक्षा के क्षेत्र में एक नया केंद्र बना रहा है, जो युवाओं को प्रेरित कर रहा है।

    नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्जनन एक सपने के साकार होने जैसा है। यह न केवल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और शैक्षणिक विरासत को पुनर्जनन करता है, बल्कि वैश्विक चुनौतियों जैसे पर्यावरणीय स्थिरता और शांति अध्ययन को भी संबोधित करता है।

    क्या आप नहीं मानते कि नालंदा का यह नया रूप प्राचीन और आधुनिक के बीच एक सेतु है? जैसे प्राचीन नालंदा ने विश्व को ज्ञान का प्रकाश दिया, वैसे ही आधुनिक नालंदा भविष्य के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा है।

    नालंदा का यह सफर खाक से शिखर तक क्या हमें यह नहीं सिखाता कि ज्ञान और दृढ़ता किसी भी विपत्ति को पार कर सकती है? नालंदा विश्वविद्यालय आज फिर से विश्व मंच पर अपनी पहचान बना रहा है और यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि मानवता के लिए ज्ञान का एक जीवंत प्रतीक है।

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    नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके।

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