
चंडी (नालंदा दर्पण)। चंडी प्रखंड का अपना ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रहा है। इसमें कोई शक नहीं दिखता। वैसे भी समय-समय पर इसकी ऐतिहाकता उजागर होते रही है।
यूं तो दीपावली के मौके पर लक्ष्मी मां की प्रतिमा बैठाने की परंपरा काफी पुरानी है। लेकिन अगर ग्रामीण इलाकों में इसकी बात करें तो सामने कई प्राचीन धरोहर दिख जाती है।इन गांवों में छिपे हैं रहस्य प्राचीन भारत की।

किसी भी गांव के भीतर जितना प्रवेश करेंगे उतना ही उसके बारे में जानने और समझने को मिलेगा। गांव की गलियां खुद अपने भेद खोलेंगी,बताएगी अपना इतिहास, संस्कृति और संस्कृति के पीछे की दास्तां।
कुछ यही दास्तां और इतिहास है चंडी प्रखंड के नरसंडा गांव की।कहने को इस गांव में भी नई शताब्दी ने दस्तक दे दी थी। पुराने शहर के गर्भ से नया शहर उभरने लगा था। पर उस गांव की संस्कृति वैसे ही बरकरार थी। जो 191 साल से चली आ रहीं है।
गांव के एक कायस्थ परिवार द्वारा पिछले 191 साल से मां लक्ष्मी की प्रतिमा बैठाने का जो सिलसिला शुरू हुआ उसका निर्वहन परिवार के सदस्य आज भी कर रहे हैं।
चंडी के नरसंडा में एक कायस्थ परिवार द्वारा पिछले 191 साल से मां लक्ष्मी की प्रतिमा बैठाने का जो सिलसिला शुरू हुआ उसका निर्वहन परिवार के सदस्य आज भी कर रहे हैं।
अंग्रेजी शासन काल में क्षेत्र के एक पटवारी हुआ करतें थे। उनका नाम था दर्शन लाल। अंग्रेजी शासन काल में उन्होंने अपने जमीन पर दस्तावेजों के रख रखाव के लिए कचहरी का निर्माण किया था। रसूखदार इतने के आसपास के क्षेत्रों में उनकी तूती बोलती थी। उनके घर अंग्रेज हुक्मरान का आना-जाना लगा रहता था।
सर्वप्रथम उन्होंने ही अपने गांव में लक्ष्मी जी की प्रतिमा बैठाने की शुरुआत की। लगभग 1830 में उन्होंने लकड़ी का सिंहासन बनाकर इस परंपरा की शुरुआत की। उन्होंने स्वयं अपने खर्च पर हर साल लक्ष्मी प्रतिमा बैठाने लगे। वे जब तक जीवित रहें, इस परंपरा का बखूबी निर्वहन किया।
फिर उनके बेटे हरिनंदन प्रसाद ने यह दायित्व ले लिया। वे 1990 तक निरंतर लक्ष्मी प्रतिमा बैठाते रहें। उसके बाद उनके पुत्र रामनरेश कुमार अम्बष्ठ ने यह जिम्मेदारी निभाना शुरू कर दिया।
उन्होंने 1983 में भव्य सिंहासन का निर्माण कराकर इस परंपरा को जीवित रखा। उनके बाद उनकी पत्नी जनक नंदनी सिन्हा ने लक्ष्मी प्रतिमा बैठाने का भार ले लिया।
बाद में उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने की वजह से तथा पुत्रों के बाहर रहने और उनका सहयोग नहीं मिलने से उन्होंने 2017 में यह जिम्मेदारी अपनी पुत्री अपर्णा बाला को दे दी। जो राम जानकी सेवा संस्थान नामक संस्था चलाती हैं।
अपर्णा बाला ने इसके लिए बजाप्ता 1970 के आसपास लक्ष्मी पूजन स्थल पर मंदिर का निर्माण भी किया गया। लगभग पांच कट्ठे की अपनी पैतृक भूमि पर उन्होंने मंदिर और यज्ञशाला का निर्माण किया था। जिसमें शिवनंदन प्रसाद के पुत्र कृष्ण मुरारी प्रसाद सिन्हा का बहुत बड़ा योगदान था।
उनके परिवार के वृद्धा जनक नंदनी सिन्हा ने बताया कि उनके पूर्वज 1830 से ही लक्ष्मीजी की मूर्ति बैठाते आ रहे हैं। जिनका निर्वहन तीसरी पीढ़ी तक 191 साल से उस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।
हालांकि इनके परिवार के अन्य सदस्य बाहर रहते हैं। बाबजूद राम-जानकी सेवा संस्थान की सचिव अपर्णा बाला और उनकी मां जनक नंदनी सिन्हा पूरे जोश के साथ मूर्ति स्थापित करतें है।
वे मानती है कि मंहगाई की मार पड़ी है। खुद अपने खर्च पर पूर्वजों की परंपरा निभाते आ रहें हैं। किसी गांव में व्यक्तिगत एक परिवार के द्वारा 191 साल से लक्ष्मी प्रतिमा बैठाने की यह अनोखा मामला है। ऐसे गांव की संस्कृति धरोहर को बचाने के लिए लोगों को, प्रशासन को आगे आना चाहिए।
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