Monday, February 16, 2026
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    15 साल बाद जनगणना की दस्तक से प्रवासियों की बढ़ी बेचैनी

    नालंदा दर्पण डेस्क। बिहारशरीफ सहित पूरे नालंदा जिले में 15 वर्ष बाद होने जा रही जनगणना 2027 को लेकर हलचल तेज हो गई है। गांव से लेकर शहर तक लोग सतर्क हैं, खासकर वे प्रवासी जो रोजगार, शिक्षा और व्यवसाय के सिलसिले में देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं।

    कई जागरूक प्रवासी मोबाइल फोन के माध्यम से अपने परिवारों से संपर्क कर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उनका नाम, आयु, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी जानकारी सही-सही दर्ज हो। ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में लोग बाहर रहने के कारण कई घरों में केवल बुजुर्ग सदस्य ही मौजूद हैं। ऐसे में सही आंकड़ा दर्ज कराने को लेकर परिवारों में चर्चा का माहौल है।

    दो चरणों में होगी जनगणनाः भारत सरकार ने 16 जुलाई 2025 को जनगणना की अधिसूचना जारी की है। यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी की जाएगी। अप्रैल से सितंबर 2026 तक मकान सूचीकरण और फरवरी 2027 में वास्तविक जनसंख्या गणना।

    प्रशासनिक सीमाएं 31 दिसंबर 2025 तक तय कर दी जाएंगी। जिला स्तर पर सांख्यिकी विभाग को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि अपर समाहर्ता को नोडल पदाधिकारी बनाया गया है।

    2011 के आंकड़ों पर एक नजरः वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार नालंदा जिले की कुल आबादी 28.77 लाख थी। इनमें लगभग 84 प्रतिशत ग्रामीण और 16 प्रतिशत शहरी आबादी शामिल थी। जनसंख्या घनत्व 1,220 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया था।

    2001 से 2011 के बीच वृद्धि दर 21.18 प्रतिशत रही। प्रति 1000 पुरुषों पर 921 महिलाओं का लिंगानुपात था। साक्षरता दर 66.41 प्रतिशत दर्ज की गई। सामाजिक संरचना में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 21.12 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की आबादी 0.05 प्रतिशत रही।

    भाषाई रूप से यहां की प्रमुख मातृभाषा मगही है, जिसे 56 प्रतिशत से अधिक लोग बोलते हैं। इसके अलावा हिंदी और उर्दू भी व्यापक रूप से प्रचलित हैं।

    इस बार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर फोकसः प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार इस बार जनगणना में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार से जुड़े विस्तृत आंकड़े भी जुटाए जाएंगे। इससे विकास योजनाओं की रूपरेखा तय करने में मदद मिलेगी।

    प्रशासन ने आम लोगों से अपील की है कि वे सही और पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराएं, ताकि जिले के वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य का आकलन हो सके।

    ऐतिहासिक विरासत के बीच आंकड़ों का नया अध्यायः बिहार के 38 जिलों में प्रमुख स्थान रखने वाला नालंदा जिला इतिहास, शिक्षा और आस्था का अद्वितीय संगम है। इसका प्रशासनिक मुख्यालय बिहारशरीफ है। दक्षिणी बिहार के मगध क्षेत्र में स्थित यह जिला विश्वप्रसिद्ध नालंदा महाविहार के कारण अंतर्राष्ट्रीय पहचान रखता है, जिसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।

    धार्मिक दृष्टि से भी नालंदा का विशेष महत्व है। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर ने यहां कई चातुर्मास बिताए थे। प्राचीन जैन ग्रंथों में नालंदा का उल्लेख राजगृह के उपनगर के रूप में मिलता है। राजगीर क्षेत्र स्थित श्वेतांबर जैन मंदिर आज भी प्राचीन प्रतिमाओं और ऐतिहासिक धरोहर को संजोए हुए है।

    प्रशासनिक इतिहास के अनुसार 9 नवंबर 1972 को नालंदा, पटना से अलग होकर स्वतंत्र जिला बना। लगभग 2,355 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस जिले से फल्गु समेत कई नदियां बहती हैं, जबकि दक्षिण में राजगीर की पहाड़ियां इसकी भौगोलिक पहचान को और विशिष्ट बनाती हैं।

    जनगणना 2027: विकास का आईनाः जनगणना केवल आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि जिले की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति का आईना है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रवासियों की बढ़ती संख्या और शहरीकरण की रफ्तार इस बार आंकड़ों में बड़ा बदलाव ला सकती है।

    ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध नालंदा अब 2027 की जनगणना के जरिए अपने विकास की नई तस्वीर पेश करने को तैयार है। गांव की चौपाल से लेकर शहर की गलियों तक एक ही चर्चा है कि इस बार नाम और पहचान सही दर्ज होनी चाहिए।

    समाचार स्रोत: मुकेश भारतीय/मीडिया रिपोर्ट्स

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