Thursday, February 12, 2026
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    सांसद कौशलेंद्र कुमार का लोकसभा में बड़ा आरोप- “समावेशी नहीं है नालंदा विश्वविद्यालय”

    12 साल बाद भी स्थानीय छात्रों की भागीदारी सीमित, फीस-स्कॉलरशिप पर उठे गंभीर प्रश्न; सांसद ने नियम 377 के तहत गंभीर मानवीय व शैक्षणिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित किया।

    बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा लोकसभा सदस्य कौशलेंद्र कुमार ने हाल ही में संसद के नियम 377 के तहत नालंदा विश्वविद्यालय में समावेशी शिक्षा और स्थानीय छात्रों की भागीदारी को लेकर गंभीर सवाल उठाए।

    उन्होंने कहा कि पुराना नालंदा विश्वविद्यालय भारत की प्राचीनतम शिक्षा परंपरा का प्रतीक है, जो प्राचीन काल में दुनिया के कोने-कोने से छात्र-विद्वानों को आकर्षित करता था। वहीं सक्रिय सरकार द्वारा खोले गए नए कैंपस के 12 साल बाद भी भारतीय छात्रों की संख्या अत्यंत कम है, और समावेशी शिक्षा की मूल भावना कहीं खोती जा रही है।

    सांसद कौशलेंद्र कुमार के अनुसार विश्वविद्यालय की उच्च फीस और भारतीय छात्रों के लिए उपयुक्त छात्रवृत्ति का अभाव कई योग्य छात्रों को प्रवेश लेने से रोकता है। स्थानीय नालंदा और बिहार के छात्रों को अधिक अवसर व प्राथमिकता नहीं मिल रही, जिससे प्रदेश के युवाओं में निराशा है।

    उन्होंने कर्मचारी नियुक्तियों में स्थानीय लोगों को तरजीह देने तथा छात्रों के लिए व्यापक छात्रवृत्ति (scholarship) प्रावधान लागू करने की मांग दोहराई। सांसद ने कहा कि विश्वविद्यालय को सिर्फ अंतरराष्ट्रीय पहचान पर केंद्रित करने के बजाय स्थानीय समस्याओं और जरूरतों को भी समावेशी शैक्षणिक पहल का हिस्सा बनाना चाहिए।

    सांसद द्वारा यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालय को सम्मेलन, शोध-कार्य और स्थानीय समुदायों के साथ संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से क्षेत्रीय विकास का केंद्र बनाया जाए, जिससे न केवल शिक्षा बल्कि स्थानीय समस्याओं का समाधान भी हो सके।

     नालंदा विश्वविद्यालय का उद्घाटन और अंतर्राष्ट्रीय भूमिकाः

    बता दें कि विगत 19 जून 2024 को नालंदा विश्वविद्यालय का नये परिसर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था, जिसमें विदेश मंत्री तथा 17 देशों के राजदूत भी शामिल थे। उन्होंने कहा था कि नालंदा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक पहचान, सम्मान और गौरव की गाथा है और इसे पुनः विश्व शिक्षा का एक केंद्र बनाना है।

    छात्रवृत्ति और विदेशी छात्रों का दृष्टिकोणः

    नालंदा विश्वविद्यालय ने कई अंतर्राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजनाएं भी शुरू की हैं, जिसमें भूटान जैसे देशों के छात्रों के लिए 2025 में 30 छात्रवृत्ति स्लॉट घोषित किए गए हैं। इस पहल से विदेशी छात्रों के लिए प्रवेश को सुविधाजनक बनाया गया है।

     स्थानीय समुदायों के साथ संवाद पहलः

    जनवरी 2026 में “Sahbhagita Samvada” नामक चौथे संवाद कार्यक्रम के तहत नालंदा विश्वविद्यालय ने आसपास के आठ स्थानीय स्कूलों के साथ साझेदारी और संवाद बढ़ाने का निर्णय लिया, जिससे शिक्षा-सम्बन्धी समावेशी प्रयासों को मज़बूती मिल सके।

    विशेषज्ञों की नजर में क्यों बनी समस्या? 

    विश्वविद्यालय को अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा और शोध केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि इससे नालंदा की वैश्विक पहचान तो बनी है, लेकिन स्थानीय युवाओं की भागीदारी अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुँच पाई है।

    फीस और छात्रवृत्ति चुनौतियां:

    देश में कई जगह यह देखा गया है कि छात्रवृत्ति में देरी या कमी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित कर सकती है , जैसा कर्नाटक में 83% छात्रों को सहायता न मिलने वाले आँकड़े से भी परिलक्षित होता है।

    स्थानीय शिक्षा संसाधन और भर्ती मुद्देः

    स्थानीय छात्रों के लिए फीस की ऊँचाई और कम छात्रवृत्ति के अलावा, कर्मचारियों की भर्ती में भी स्थानीय लोगों को प्राथमिकता न मिलने की शिकायतें उठ रही हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और शिक्षा में संतुलन बनाए रखने में कठिनाई हो रही है।

    इस मुद्दे से राजनीति भी जुड़ी हैः

    हाल के नालंदा विधान सभा चुनाव के परिणाम से स्पष्ट है कि क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण शिक्षण व सामाजिक मुद्दों पर भी आधारित हैं। 2025 के चुनाव में नालंदा से श्रवण कुमार (JDU) ने जीत दर्ज की, जबकि सांसद कौशलेंद्र कुमार (कांग्रेस) भी महत्वपूर्ण वोट प्राप्त कर रहे हैं।

    इससे यह संकेत मिलता है कि शिक्षा, रोजगार, समावेशी नीतियाँ और स्थानीय हित आगामी चुनावी रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा बनते जा रहे हैं।

    आगे क्या उम्मीदें हैं?

    सांसद कौशलेंद्र कुमार ने लोकसभा में यह स्पष्ट किया है कि नालंदा विश्वविद्यालय को भारत के गौरवशाली अतीत के अनुरूप समावेशी, स्थानीय समर्थित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाना होगा।

    विशेषज्ञ सलाह के मुताबिक स्थानीय छात्रों के लिए अधिक छात्रवृत्ति और किफ़ायती फीस स्कीम लागू हो। स्थानीय समाज के साथ कार्यक्रम, शोध-प्रोजेक्ट और संवाद गतिविधियों को नियमित बनाया जाए। कर्मचारियों और प्रशिक्षण में स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता दी जाए।

    नालंदा विश्वविद्यालय न केवल भारत का गौरव है, बल्कि विश्व शिक्षा के लिए एक महान प्रतीक भी रहा है। हालांकि इसके पुनर्निर्माण के प्रयासों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, लेकिन समावेशी शिक्षा, स्थानीय छात्रों की भागीदारी और सामाजिक-आर्थिक निष्पक्षता के सवाल अभी भी बेनज़र हैं।

    बहरहाल सांसद के आरोप और मांगें अब शिक्षा नीति निर्माताओं और सरकार के लिए एक चुनौती बन चुकी हैं कि वह नालंदा को एक ऐसे विश्वविद्यालय के रूप में पुनः स्थापित करें जो स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर विद्यार्थी-हितैषी हो।

    समाचार स्रोतः नालंदा दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय / मीडिया रिपोर्टस्

    Nalanda Darpanhttps://nalandadarpan.com/
    नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके।

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