संवेदनहीन समाजः नालंदा में नवजात बेटियों को फेंकने की प्रवृत्ति चिंताजनक

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले में नवजात बेटियों को फेंकने की प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। यह प्रवृत्ति सभ्य समाज के लिए कलंक समान है और बीते कुछ वर्षों में इसमें वृद्धि देखी गई है। दो साल पहले जहां चार से छह नवजात शिशु फेंके हुए मिले थे। वहीं वर्ष 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर नौ से 12 तक पहुंच गया है। इनमें चार नवजात अस्पतालों से पांच विभिन्न क्षेत्रों की झाड़ियों और खेतों से तथा दो सड़क किनारे से बरामद किए गए। चिंता की बात यह है कि इनमें से कई नवजातों की मौत प्रशासन के संज्ञान में आने से पहले ही हो जाती है।

फिलहाल वर्ष 2024 में बचाए गए नौ नवजात विशिष्ट दत्तक ग्रहण संस्थान (सीडब्ल्यूसी) की देखरेख में हैं। यह प्रवृत्ति समाज की मानसिकता को उजागर करती है और यह दिखाती है कि बेटियों को अब भी कई परिवारों द्वारा बोझ समझा जाता है। यह स्थिति ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान पर भी सवाल खड़े करती है। आंकड़ों के अनुसार फेंके गए नवजातों में 97 फीसदी लड़कियां होती हैं, जो समाज के भेदभावपूर्ण रवैये को दर्शाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार नवजात शिशुओं को फेंके जाने के पीछे दो प्रमुख कारण सामने आते हैं। पहला बेटी होने के कारण उन्हें अस्वीकार किया जाना और दूसरा गंभीर बीमारी से ग्रस्त बच्चों को पालने और इलाज के खर्च से बचने की मानसिकता।

विशिष्ट दत्तक ग्रहण संस्थान में रह रही नवजात लड़कियों को ऑनलाइन माध्यम से देश-विदेश के संपन्न दंपतियों द्वारा गोद लिया जा रहा है। फिलहाल वर्ष 2024 में बचाए गए नौ नवजातों में से दो को गोद लेने की प्रक्रिया जारी है। इनमें मोनी कुमारी (काल्पनिक नाम) को अमेरिका के एक दंपत्ति गोद ले रहे हैं। जबकि तन्वी को पुणे महाराष्ट्र के एक डॉक्टर दंपत्ति अपनाने की प्रक्रिया में हैं। इससे पहले भी दो अन्य नवजात बेटियां संपन्न परिवारों में पहुंच चुकी हैं। लेकिन प्रत्येक नवजात इतना सौभाग्यशाली नहीं होता। आंकड़ों के अनुसार मात्र 10-20 प्रतिशत नवजातों को ही दत्तक माता-पिता मिलते हैं।

बिहारशरीफ सदर अस्पताल में दो सप्ताह पहले एक नवजात बेटी रिद्धि कुमारी को जन्म के तुरंत बाद उसके माता-पिता छोड़कर फरार हो गए। अस्पताल सूत्रों के अनुसार नवजात की माँ, सास और पति अस्पताल में मौजूद थे। लेकिन परिवार पहले से ही पांच बेटियों का बोझ महसूस कर रहा था। ऐसे में उन्होंने नवजात को वहीं छोड़ दिया। अब वह विशिष्ट दत्तक ग्रहण संस्थान की देखरेख में है।

इसी प्रकार नगरनौसा थाना क्षेत्र के उसमानपुर गांव में अप्रैल 2024 में नौ माह की एक बच्ची मोनी कुमारी को टमाटर के खेत में फेंका गया था। एक ग्रामीण महिला ने उसे बचाकर गोद लेने की इच्छा जताई। लेकिन प्रशासनिक जटिलताओं के कारण वह पीछे हट गई। अब उसे अमेरिका के एक दंपत्ति द्वारा गोद लिए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

सितंबर 2024 में कल्याण बिगहा थाना क्षेत्र में सड़क किनारे झाड़ियों में दो-तीन दिन की नवजात तन्वी कुमारी को फेंका हुआ पाया गया। विशिष्ट दत्तक ग्रहण संस्थान के समन्वयक वैभवी कुमारी के प्रयासों और उचित चिकित्सा देखरेख से अब वह पूरी तरह स्वस्थ है। वर्तमान में नौ माह की हो चुकी तन्वी को पुणे के डॉक्टर दंपत्ति गोद लेना चाहते हैं।

नवजात बेटियों को फेंकने की घटनाएं समाज के उस असंवेदनशील चेहरे को उजागर करती हैं, जो अब भी लड़कियों को बोझ मानता है। सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान चलाए जाने के बावजूद मानसिकता में अपेक्षित बदलाव नहीं दिख रहा है। प्रशासन को इस दिशा में सख्त कदम उठाने होंगे और समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। ताकि कोई भी नवजात बेटी इस प्रकार त्यागी न जाए और उन्हें जीने का अधिकार मिल सके।

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