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    Saturday, March 2, 2024
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      नालंदाः 3000 साल पुरानी सभ्यता-संस्कृति से पोषित करता एक लुप्त नगर रूखाई

      नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार के नालंदा जिले के चंडी और आस-पास का क्षेत्र केवल धार्मिक महत्व को ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व को भी समेटे हुए है। धार्मिक, बौद्धकालीन,ऐतिहासिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण से चंडी प्रखंड का अपना अलग महत्व रहा है।

      चंडी मगध के नौ सिद्ध स्थलों में एक माना जाता है। इस स्थल के दोनों छोरो पर मुहाने नदी है।

      छठी शताब्दी के राजनीतिक पराकाष्ठा के दौरान मगध तथा इसकी राजधानी राजगृह के बीच में स्थित चंडी का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लोक स्मृति की व्यापकता ही इसका प्रमाण माना जाता है।

      ऐसा कहा जाता है कि चीनी यात्री फाहियान नालंदा विश्वविद्यालय जाने के दौरान रूखाई-नवादा के पास ढिबरा गाँव पर रात्रि विश्राम किया था।

      पटना से लगभग 50किलोमीटर दूर चंडी-हिलसा जैतीपुर  के पास से दायी तरफ मुड़कर लगभग दो किलोमीटर चलकर उस गांव तक पहुंचा जा सकता है, जिसे रूखाई कहा जाता है।जो लगभग 3000 साल का इतिहास समेटे हुए है।

      कुछ साल पहले  पुरातत्वविद गौतम लांबा की देख रेख में इस स्थल की  पुरातात्विक खुदाई की गयी थी। कहा जाता है कि पाटलिपुत्र से सीधे रूखाई के रास्ते ही नालंदा और राजगृह पहुंचा जा सकता था।

      आठवीं सदी तक यह एक नगर हुआ करता था। कालांतर में अज्ञात कारणों से इस क्षेत्र की सभ्यता व संस्कृति लुप्त हो गयी। कभी खेतों  में प्राचीन अवशेष व छोटे-छोटे मंदिर इस स्थान पर मिलते थे। कितने  ही दुलर्भ पुरातात्विक  महत्व की वस्तुएं नष्ट हो गयी। केवल यह छोटा सा हिस्सा ही पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया है।

      मौर्य काल, शुंग, कुषाण, गुप्त काल, मुगल वंश के समकालीन जीवन शैली एक ही स्थान पर पाएं गये।इस टीले की खुदाई से ज्ञात हुआ कि लगभग दो किलोमीटर के क्षेत्रफल में बौद्ध काल से ही पूर्व‌ यहां अपनी संस्कृति फैलीं हुई थी। एक समृद्ध नगरीय व्यवस्था थी,जो बौद्ध भिक्षुओं को आकर्षित करती थी। खुदाई में जो कुएं मिले थे, वो शुंग और कुषाण वंश‌‌ के संकेत देते है।

      चीनी यात्री हृवेनसांग की यात्रा के दौरान भी यह एक विस्तृत नगर था। इस उत्खनन स्थल से आठवीं सदी से तीसरी सदी की प्राचीन मुद्राएँ,मिटटी के बर्तन, मूर्तियाँ व अन्य अवशेष प्राप्त हुए हैं। जिन्हें पुरातत्व विभाग द्वारा पहली सदी से तीसरी सदी के दौरान, दीवारों में प्रयुक्त कच्ची ईंट, चौथी से पांचवीं सदी में पक्की ईंटों से निर्मित फर्श, सातवीं व आठवीं सदी के पक्की ईंटों से निर्मित कुछ आवासीय संरचनाएं इस उत्खनित स्थल से प्राप्त हुई थी।

      कहा जाता है कि कभी प्रलयकारी बाढ़ से यह नगर नष्ट हो गया। जिस क्षेत्र की पूरी सभ्यता व संस्कृति लुप्त हो गयी, उस क्षेत्र का अन्य ऐतिहासिक स्थलों की तरह सूक्ष्मता से उत्खनन व विश्लेषण कर के यह पता अवश्य लगाया जाना चाहिए कि आखिर अचानक ही एक समृद्ध सभ्यता व संस्कृति लुप्त क्यों और कैसे हो गयी?

      वर्तमान स्थिति को देखकर बहुत दुःख हुआ कि तीन हजार साल का इतिहास समेटे यह उत्खनन स्थल खुले आकाश के नीचे आज भी प्रकृति के थपेड़े सह रहा है। लेकिन स्थानीय निवासियों को भी इस उत्खनन स्थल के महत्व का ज्ञान नहीं है, न इस स्थल को देखने के लिए कोई उत्सुक पर्यटक यहाँ पहुंचते हैं।

      ऐतिहासिक धरोहरो की उपेक्षा एक अतुलनीय हानि है। इन अमूल्य प्राचीन सभ्यताओं की वास्तुकला के नमूने व संस्कृति को दर्शाने वाले ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

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