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      घरों के मुंडेरों-छतों से गुम हो गया स्वर्णिम दूरदर्शन का एंटीना

      "रविवार तो आ जाता है, पर रामायण,महाभारत,चंद्रकांता,अलिफ लैला,विक्रम बैताल,सिंहासन बतीसी,रजनी,देखो मगर प्यार से,हम पांच,रंगोली नहीं आता,बुधवार-शुक्रवार तो आ जाता है लेकिन चित्रहार नहीं आता है।सप्ताह तो बीत जाता है,पर वो 'बुनियाद' नहीं रहा अब, कहां वो अब रविवार होता है,साथ जब पूरा परिवार होता है.......?"

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      नालंदा दर्पण डेस्क। एक दौर था जब दूरदर्शन का राज चलता था। कौन याद नहीं करना चाहेगा उन सुनहरे दिनों को जब मोहल्ले के इक्के-दुक्के रइसों के घर में टीवी हुआ करता था और सारा मोहल्ला टीवी में आ रहे कार्यक्रमों को आश्चर्यचकित सा देखता था।

      लोगों के घरों में टेलीविजन स्टेटस सिंबल हुआ करता था। मुहल्ले में जिसके घर में टेलीविजन होता था, लोगों की नजर में उनकी इज्जत बढ़ जाती थी। एक जमाना था कि दूरदर्शन पर अनेक कार्यक्रम देश भर के दर्शकों के लिए ओढ़ना बिछौना बन गया था।

      Swarnim Doordarshans antenna lost from Mundar roofs of houses in a crowd of channels 3

      दूरदर्शन‌ ने अपनी छवि एक दृश्य श्रव्य माध्यम के रूप में बनाई थी और खूब बनाई। छोटे पर्दे का प्रभाव गांव-कस्बों,नगरों-महानगरों से लेकर झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला गरीब-गुरबा भी अपना काफी समय टीवी के पर्दे पर अवश्य गुजारता था।

      15 सितंबर,1959 को जब दूरदर्शन का शुभारंभ हुआ था, तब आरंभ में किसी ने कल्पना नहीं की थी कि 2008 आते-आते केबल टीवी चैनलों और डिजिटल चैनलों की भरमार हो जाएगी। दूरदर्शन‌ के एंटीना की जगह हर छतों पर करीने से छतरियों की बाढ़ सी आ जाएगी।

      घरों की छतों से दूरदर्शन का एंटीना क्या गायब हुआ कि आज की युवा पीढ़ी भी इससे बिल्कुल अंजान हो गई। वह सेट अप बाक्स और छतरी तो जानती है, लेकिन एंटीना किस चिड़िया का नाम है, उस सबंध‌ में वह अंजान है।

      नालंदा के चंडी प्रखंड के दर्जनों गांव में ‘नालंदा दर्पण’ टीम ने घरों की छतों पर एंटीना की  खोज की। युवा पीढ़ी से पूछताछ की। लेकिन न तो एंटीना नजर आया और न ही एंटीना के बारे में किसी को जानकारी है।

      बहुत खोजबीन के बाद चंडी मुख्यालय से सटे एक गांव गोखुलपुर के एक घर में जमीन से एक लकड़ी के सहारे खड़ा एंटीना मिल ही गया। वो भी एक अजूबे की तरह कि आज डिजिटल और केबल के जमाने में भी कोई तो है, जो दूरदर्शन की यादों को आज भी सहेज रखा है।

      वैसे अब सुदूर ठेठ गांव में जहां सड़क नहीं पहुंची है, लेकिन घर की छतों पर सरकारी और निजी डीटीएच दिख जाएगा।इन सब के बीच एंटीना गुम सा हो गया है।

      Swarnim Doordarshans antenna lost from Mundar roofs of houses in a crowd of channels 2
      पीएचईडी विभाग से सेवानिवृत एवं क्षेत्र के जाने-माने समाजसेवी मो. खुर्शीद अहमद….

      चंडी प्रखंड के दूरदर्शन के सबसे पुराने दर्शक और पीएचईडी विभाग से सेवानिवृत मो. खुर्शीद अहमद उन सुनहरे दिनों की याद करते हुए बताते हैं, ” वह दौर अब आने वाला नहीं है,जब 70से लेकर 90 के दशक तक दूरदर्शन की लोकप्रियता चरम पर थी। उन दिनों चंडी में भी एक दो घरों में ही टेलीविजन आया था”।

      चंडी में सबसे पहला रंगीन टेलीविजन लाने का श्रेय मो खुर्शीद अहमद को जाता है। वे बताते हैं रंगीन टेलीविजन के लिए उन्होंने दिल्ली से आर्डर किया था, जो पटना आया था। वहां से उन्होंने अपने घर चंडी लाए थे।

      दूरदर्शन के कार्यक्रम लोगों के लिए ओढ़ना-बिछौना था: 80-90 के दशक में दिल्ली दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले विक्रम-बेताल,सिंहासन बतीसी, दादा-दादी की कहानियां, मालगुडी डेज, द सोर्ड आफ टीपू सुल्तान, मशाल, सांझा चूल्हा, संसार, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, हमलोग, बुनियाद, जंगल बुक, अदालत, चित्रहार, रंगोली सहित प्रसारित होने वाली फिल्मों का भी अपना क्रेज था।

      लोग एक दूसरे के घरों में जाकर धारावाहिक और फिल्में देखा करते थे। मतलब दर्शकों के लिए ये धारावाहिक किसी ओढ़ना बिछौना से कम नहीं था।

      चंडी के बृजबिहारी प्रसाद, प्रकाश साव, दिवंगत डॉ. केडीपी वर्मा, श्याम नारायण लाल के घर पर धारावाहिक देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था।

      खुर्शीद अहमद खुद क्रिकेट और फिल्मों के दीवाने थे। जब कोई क्रिकेट मैच का प्रसारण होता तो इनके घर के आगे लोग खिड़की और दरवाजे से झांककर मैच का आनंद लिया करते थे।

      वे आगे बताते हैं जब क्रिकेट का विश्व चल रहा था, वह 1983का साल था। लोगों ने वर्ल्ड कप देखने के लिए भी टीवी सेट खरीदना शुरू कर दिया था।

      चंडी अंचल कार्यालय के पास एक दवा दुकानदार बृजबिहारी प्रसाद भी एक समय टेलीविजन के दीवाने थे। इन्होंने तो अपनी दुकान पर ही टेलीविजन सेट लगा रखा था।

      जब भी कोई क्रिकेट मैच आता या फिर रविवार शाम को फिल्म आती, इनकी दुकान के पास सैकड़ों लोगों की भीड़ लग जाती थी।

      दूरदर्शन के एंकर गांव-गांव में थे लोकप्रिय: ऐसा नहीं था कि उस दशक का दर्शक सिर्फ धारावाहिक और फिल्मों का ही शौकीन था। बल्कि वह काफी गंभीरता के साथ दूरदर्शन पर आने वाले समाचारों को भी देखा करता था।

      मो खुर्शीद अहमद बताते हैं कि दूरदर्शन के एकंर गांव-गांव में लोकप्रिय थे। आज की तरह उछल कूद करने वाले,चीखने वाले एकंर की तरह नहीं होते थे। वे बहुत ही सौम्यता और शालीनता के साथ समाचार पढ़ते थे। गलती होने पर दर्शकों से माफी मांग लेते थे। लोग उनकी आवाज सुनकर ही उनके नाम बता देते थे।

      मो खुर्शीद अहमद उन समाचार वाचकों को याद करते हैं, जिनकी आवाज में एक खनक होती थी,जादू होता था। सलमा सुल्तान, जिस रात खबर पढ़ने आ जाती, लोग अपने टीवी सेट की आवाज बढ़ा देते थे।

      इनके अलावा शम्मी नारंग, मीनू तलवार, शोभना जगदीश, मंजरी जोशी, वेद प्रकाश और सरला माहेश्वरी के समाचार प्रस्तुति का अंदाज और आवाज के सभी कायल थे।

      दूरदर्शन के दो अधिकारी चंडी भी रह चुके थे: मो खुर्शीद अहमद बताते हैं, जब पटना दूरदर्शन अस्तित्व में आया और समाचार का प्रसारण शुरू हुआ तो उनके ही एक साथी रत्नेश‌ कुमार समाचार वाचक बने। जब उन्होंने रत्नेश‌ कुमार को पहली बार समाचार पढ़ते देखा तो अपार खुशी हुई।

      गौरतलब रहे कि रत्नेश कुमार के पिताजी नागेश्वर प्रसाद सिन्हा चंडी प्रखंड कार्यालय में हेड क्लर्क हुआ करतें थे। उनका काफी साल चंडी में ही बीता।

      मो खुर्शीद अहमद याद करते हुए बताते हैं कि रत्नेश नाटक भी बहुत अच्छा करता था। हम दोनों ने कई नाटक साथ किये थे।

      इतना ही नहीं पटना दूरदर्शन से जुड़े एक और अधिकारी का बचपन चंडी में ही बीता था। पटना दूरदर्शन के सहायक निदेशक रहें कृष्णा प्रसाद के पिताजी तालुकराज प्रसाद चंडी में कोऑपरेटिव इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे और मंदिर गली के एक मकान में रहते थे।

      वे बहुत साल बाद एक बार चंडी आएं थे। उन्होंने चंडी के डाक-बंगला से लेकर मंदिर तथा यहां के लोगों के बारे में भी जानकारी हासिल की थी।

      इस संबंध में भाजपा नेता मनोज कुमार सिन्हा याद करते हैं, वे जब चंडी आए थे तो कृष्णा प्रसाद मेरे घर भी आएं थे। उन्होंने चंडी के इतिहास के बारे में भी जानकारी ली थी।

      घरों से एंटीना गायब होने पर मो खुर्शीद अहमद बताते हैं, आजकल वह पीढ़ी अब नहीं रह गई है। मोबाइल-इंटरनेट और तेजी से आ रहे विभिन्न प्रकार के मनोरंजन चैनलों की बाढ़ में दर्शकों का दूरदर्शन से मोह भंग हो गया है।

      वहीं भाजपा नेता मनोज कुमार सिन्हा कहते हैं कि एक समय हुआ करता था कि लोग चित्रहार देखने से पहले क़ृषि दर्शन और रात्रि की फिल्म देखने के लिए भरतनाट्यम कार्यक्रम भी देख लिया करते थे। वह रोमांच ही कुछ और था।

      दूरदर्शन पर मनोरंजन, ज्ञान, समाचार, संस्कृति-इतिहास, नाटक सब कुछ एक ही जगह मिल जाता था। आजकल के चैनलों की तरह अलग-अलग नहीं।

      वेशक उन कार्यक्रमों की कहानियां और मनोरंजन स्तर इतना अच्छा हुआ करता कि आज कोई भी टीवी सीरियल या कार्यक्रम उसके बराबर नहीं लगते हैं। हम चाहे किसी दौर में हो, लेकिन दूरदर्शन की महता को इंकार नहीं कर सकते है।

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