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      हिरण्य पर्वत पर ही तथागत ने किया था अंतिम वर्षावास

      नालंदा दर्पण डेस्क। उदंतपुरी, जिसे आज लोग बिहारशरीफ के नाम से जानते हैं। यहां स्थित बड़ी पहाड़ी नाम से परिचित हिरण्य पर्वत का समृद्ध इतिहास रहा है।

      भगवान बुद्ध ने अपना अंतिम वर्षावास इसी पर्वत पर किया था। लेकिन इस पहाड़ी पर बुद्ध से जुड़ी कोई भी स्मृति नहीं है। उत्सुकता से लबरेज बौद्ध भिक्षु यहां आते तो हैं, लेकिन पहाड़ी पर मंदिर व मस्जिद के दर्शन कर लौट जाते हैं।

      Tathagata did the last rain stay on Hiranya mountain 2पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पहाड़ी पर पार्क, जिम, अतिथिशाला, यात्री शेड, पहुंच पथ एवं सीढि़यों का निर्माण हाल के वर्षो में कराया गया है। इतिहास के जानकार योगेन्द्र मिश्र एवं गदाधर प्रसाद अम्बष्ट के अनुसार भगवान बुद्ध के अंतिम वर्षावास का स्थान बिहारशरीफ की पहाड़ी ही थी।

      चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत में लिखा है कि राजगीर और गंगा के मध्य निर्जन पहाड़ी पर बुद्ध ने सन् 487-488 ई.पूर्व वर्षावास किया था। यह पहाड़ी उदंतपुरी नगर में अवस्थित थी। जिसे लोग पाश्‌र्र्ववती पहाड़ी कहते हैं।

      ह्वेनसांग ने यहां की अवलोकितेश्वर बुद्ध की चन्दन निर्मित छोटी व अत्यंत सुन्दर प्रतिमा का वर्णन किया है। इस प्रतिमा का लंका के राजा ने स्वप्न में दर्शन किया था और पता लगाते हुए यहां आ पहुंचा।

      Tathagata did the last rain stay on Hiranya mountain 3

      उन्होंने प्रतिमा की षोडसोप नामक चार पूजा भी की थी, जिसका ह्वेनसांग ने विस्तृत विवरण दिया है। पहाड़ी पर साम्ये विहार बना था, जहां बुद्ध ने वर्षावास किया था।

      इतिहास के जानकार बताते हैं कि राजगीर से पैदल चलकर भगवान बुद्ध उदंतपुरी (बिहारशरीफ) पहुंचे थे। 743 ईश्वी में तिब्बत के राजा खि-श्रान-डिड-प्सन के निमंत्रण पर बौद्ध पंडित शांति रक्षित इसी ‘साम्ये विहार’ का माडल तिब्बत ले गये थे।

      तिब्बत में 749 ई. में ‘साम्ये विहार’ का निर्माण पूर्ण हुआ। इसी विहार के माध्यम से तिब्बत में अवलोकितेश्वर स्वरूप की पूजा प्रारम्भ हुई और तिब्बत बौद्ध धर्म प्रधान देश के रूप में जाना जाने लगा। इस तरह तिब्बत को उसका राजधर्म देने का गौरव उदंतपुरी (बिहारशरीफ) को प्राप्त है।

      बताते चलें कि 750 ई. में उदंतपुरी पर बख्तियार खिलजी ने कब्जा किया तो हिरण्य पर्वत पर बने बौद्ध विहार को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद 1353 ई. में शासक मल्लिक इब्राहिम बयां की मृत्यु हुई तो उसे पहाड़ी पर दफनाया गया और भव्य मकबरे का निर्माण कराया गया, जो आज भी विद्यमान है।

      बुद्ध सर्किट से जल्द जुडे़गी बड़ी पहाड़ीः डीएम

      जिलाधिकारी संजय कुमार अग्रवाल ने बताया कि बड़ी पहाड़ी को जल्द ही बुद्ध सर्किट से जोड़ने का प्रयास किया जायेगा। इसके लिए लिखा-पढ़ी शुरू कर दी गयी है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन सरकार की मदद से भगवान बुद्ध से जुडे़ गुमनाम स्थलों की खोज करा रहा है।

      राजगीर प्रवास के दौरान मुख्यमंत्री ने कई दिशा-निर्देश दिये थे। उसी के आलोक में दो शोध संस्थानों को भगवान बुद्ध से जुडे़ स्थलों की जानकारी इकट्ठा करने की जिम्मेदारी दी गयी थी।

      हिरण्य पर्वत बड़ी पहाड़ी पर भगवान बुद्ध के अंतिम वर्षावास किये जाने का विवरण चीनी यात्री ह्वेनसांग व फाहियान के यात्रा वृतांत में मिला है। उसी के मद्देनजर पर्यटकों के लिहाज से हिरण्य पर्वत को विकसित किया गया है।

       

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