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    Friday, April 4, 2025
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      Nalanda

      चीन की दीवार से पुरानी राजगीर साइक्लोपियन वाल की अनकही कहानी

      राजगीर (नालंदा दर्पण)। क्या आपने कभी सुना है कि बिहार में एक ऐसी दीवार है, जो चीन की महान दीवार से भी पुरानी है? जी हाँ, वह है राजगीर साइक्लोपियन वाल। एक ऐतिहासिक धरोहर जो न केवल समय की परीक्षा में खड़ी रही है, बल्कि अब एक नई पहचान की ओर बढ़ रही है।

      राजगीर बिहार का एक प्राचीन नगर, जहां ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का खजाना छिपा हुआ है। यहाँ की साइक्लोपियन वाल करीब ढाई हजार साल पुरानी है और यह दीवार राजगीर की पंच पहाड़ियों को जोड़ती है। इसे एक अभेद्य किला माना जाता था। जिसे नगर की सुरक्षा के लिए बनाया गया था।

      आपको जानकर हैरानी होगी कि इस दीवार की बनावट न केवल पुराने जमाने की इंजीनियरिंग का बेहतरीन उदाहरण है, बल्कि यह चीन की महान दीवार से भी पुरानी मानी जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 40 किलोमीटर है और यह सोनागिरी और उदयगिरी पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपर फैली हुई है।

      हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस दीवार के महत्व को समझने के लिए शोध कार्य शुरू किया है। इसके साथ ही इस दीवार को विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कई बार प्रयास किए हैं।

      पारंपरिक इतिहासकारों के अनुसार यह दीवार महाभारत काल में राजा बृहद्रथ द्वारा बनाई गई थी और बाद में सम्राट जरासंध ने इसका विस्तार किया। पाली ग्रंथों में भी इसका जिक्र मिलता है।

      इस दीवार में कुल 32 विशाल और 64 छोटे प्रवेश द्वार थे, जिनके माध्यम से ही लोग राजगीर में प्रवेश कर सकते थे। दीवार के हर 50 मीटर पर सुरक्षा चौकियाँ और हर पाँच गज पर सशस्त्र सैनिक तैनात रहते थे।

      यह दीवार चार मीटर ऊँची और 22 फीट चौड़ी है। और इसे बनाने में ऐसे प्राकृतिक तत्वों का उपयोग किया गया था, जो दीवार को समय की धारा में भी मजबूती से खड़ा रखते हैं।

      आज एएसआई द्वारा किए जा रहे शोध और इस दीवार के संरक्षण के कारण साइक्लोपियन वाल के वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल होने की संभावनाएँ प्रबल हो गई हैं। अगर यह दीवार यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल होती है तो यह न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का विषय होगा।

      इसके अलावा इस स्थल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है। यह एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण बन सकता है, जो बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को और भी अधिक पहचान दिलाएगा।

      अब यह देखना दिलचस्प होगा कि एएसआई के इस शोध से साइक्लोपियन वाल का कौन सा नया इतिहास सामने आता है और यह भारत की धरोहरों की सूची में एक नई पहचान कैसे स्थापित करती है।

      बिहार की ऐतिहासिक धरोहर को जानने और समझने का यह मौका हमें अपने इतिहास और संस्कृति से जुड़ने का अवसर देता है। क्या आप तैयार हैं इस अद्भुत यात्रा पर चलने के लिए? आइए साइक्लोपियन वाल की रहस्यमय दुनिया का अन्वेषण करें।

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