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मघड़ा शीतला माता मंदिर में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़, दर्जनों गांव में नहीं जले चूल्हे

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहारशरीफ प्रखंड क्षेत्र अंगर्गत मघड़ा गांव स्थित शीतला माता मंदिर में सोमवार से ही पूजा अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है। श्रद्धालुओं की भीड़ से पूरा मेरा क्षेत्र गुलजार हो रहा है।

Crowd of devotees gathered in Maghada Shitala Mata temple stoves not lit in dozens of villages 1नालंदा जिले के साथ-साथ आस पड़ोस के कई जिलों के श्रद्धालु सुबह से ही मंदिर में पूजा अर्चना कर अपनी अपनी मन्नतें मांग रहे हैं। श्रद्धालुओं की लंबी कतारें माता के जयकारे लगाते हुए दर्शन के लिए अपनी बारी का घंटों इंतजार करते देखे जा रहे हैं।

जगह-जगह पर खुली अस्थाई दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ लग रही है। मेला क्षेत्र में तरह-तरह के झूले तथा मनोरंजन के अन्य साधन भी मौजूद हैं। प्रसाद से लेकर नाश्ते की दुकानों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लग रही है। शीतलाष्टमी के अवसर पर और अधिक भीड़ होने की उम्मीद है। माता शीतला का आशीर्वाद लेने दूर दराज से लोग आ रहे हैं।

ऐसी मान्यता है कि शीतला माता मंदिर के पास बने शीतल कुंड तलाव में स्नान कर मंदिर में पूजा अर्चना करने से चेचक जैसी भयानक बीमारी से निजात मिल जाती है। सभी प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।

शीतला माता पंडा कमेटी के अध्यक्ष के अनुसार यहां निःसंतान लोगों को संतान तथा निर्धन लोगों को धन की प्राप्ति होती है। इसलिए यहां सालों भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। बड़ी संख्या में लोग मन्नत पूरी होने पर अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी यहां कराते हैं।

आज मघड़ा सहित दर्जनों गांवों में नहीं जल चूल्हेः आज मंगलवार को चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के अवसर पर मघड़ा गांव सहित आस पड़ोस के लगभग एक दर्जन गांवों में चूल्हे नहीं जलाए गए हैं।Crowd of devotees gathered in Maghada Shitala Mata temple stoves not lit in dozens of villages 2

मान्यता है कि इस दिन चूल्हे जलाने से माता को तकलीफ होती है, जिसका अनिष्ट फल मिलता है। इसलिए आसपास के किसी भी गांव में आज मंगलवार को चूल्हे नहीं जलाए गए हैं।

इसके लिए सोमवार को सप्तमी तिथि को ही ग्रामीणों के द्वारा मीठी कुआं के जल से प्रसाद के रूप में भोजन सामग्री पकाई गई है।

भोजन सामग्री के रूप में अरवा चावल, चना की दाल, लाल साग, सब्जी, पुरी आदि बनाए जाते हैं, जो माता को अर्पित कर अगले दिन अष्टमी तिथि को प्रसाद के रूप में ग्रामीणों के द्वारा ग्रहण किया जाएगा। इसे बसियौड़ा प्रसाद कहा जाता है। अष्टमी तिथि के दिन ग्रामीणों के द्वारा अपने सगे संबंधियों को भी यही बसियौड़ा प्रसाद खिलाया जाता है।

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