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    Sunday, April 21, 2024
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      वैदिक काल से सूर्योपासना का केंद्र रहा है सूर्यपीठ बड़गांव, जानें महिमा

      नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा स्थित सूर्यपीठ बड़गांव वैदिक काल से सूर्योपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यह स्थान दुनिया के 12 अर्को में से एक है। ऐसी मान्यता है कि यहां छठ करने से हर मुराद पूरी होती हैं।

      यही कारण है कि देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां चैत एवं कार्तिक माह में छठव्रत करने आते हैं। भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा बड़गांव से ही शुरू हुई थी, जो आज पूरे भारत में लोक आस्था का पर्व बन गया है।

      सूर्यपीठ बड़गांवभगवान कृष्ण के गोत्र साम्ब को मिली थी कुष्ठ रोग से मुक्तिः ऐसी मान्यता कि महर्षि दुर्गाशा जब भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका गये थे, उस समय भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ बिहार कर रहे थे। उसेी दैरान अचानक किसी बात पर भगवन श्रीकृष्ण के पौत्र राजा साम्ब को हंसी आ गई। महर्षि दुर्वासा ने उनकी हंसी को अपना उपहास समझ राजा सम्ब को कुष्ट होने का श्राप दे दिया। इस कथा का वर्णन पुराणों में भी हैं।

      इसके बाद श्रीकृष्ण ने राजा साम्ब को कुष्ट रोग से निवारण के लिए सूर्य की उपासना के सब सूर्य राशि की खेज करने की सलाह दी थी। उनके आदेश पर राजा शम्ब सूर्य राशि की खोज में निकल पड़े। रास्ते में उन्हें प्यास लगी।

      राजा शाम्ब ने अपने साथ में चल रहे सेवक को पानी लाने का आदेश दिय। घने जंगल होने के कारण पानी दूर-दूर तक नहीं मिला। एक जगह गड्ढे में पान तो था, लेकिन वह गंदा था। सेवक ने उसी गड्ढे का पानी लाकर राजा को दिया।

      राजा ने पहले उस पानी से हाथ-पैर धोया उसके बाद उस पानी से प्यास बुझायी पानी पीते ही उन्होंने अपने आप में अप्रत्याशित परिवर्तन महसूस किया। इसके बाद राजा कुछ दिनों तक उस स्थान पर रहकर गड्ढे के पानी का सेवन करते रहे। राजा शाम्ब ने 49 दिनों तक बरोक (वर्तमान का बड़गांव) में रहकर सूर्य की उपासना की थी।सूर्यपीठ बड़गांव 2

      राजा साम्ब ने बनवाया था बड़गांव का तालाबः  राजा सम्ब ने गड्ढे वाले स्थान की खुदाई करके तालाब का निर्माण कराया। इसमें स्नान करके आज भी कुष्ट जैसे असाध्य रोग से लोग मुक्ति पाते हैं। आज भी यहां कुष्ट से पीड़ित लोग आते हैं और तालाब में स्नान कर सूर्य मंदिर में पूजा अर्चना करने पर उन्हें रोग से मुक्ति मिल गई।

      चार दिनों तक चप्पल नहीं पहनते हैं बड़गांव के लोगः पवित्रता का पर्व छठ के नहाय से दूसरी अर्ध्य तक बड़गांव के ब्राह्मण टोले के लोग चप्पल नहीं पहनते हैं। यह परंपरा उनके बुजुर्गों द्वारा शुरू की गयी है, जिसका पालन अबतक किया जाता है। चप्पल नहीं पहरने का मुख्य मकसद यह कि प्रतियों को किसी तरह की असुविधा न हो।

      तालाब खुदाई में मिलीं मूर्तियां: तालाब की खुदाई के दौरान भगवान सूर्य, कल्प विष्णु, सरस्वती, लक्ष्मी, आदित्य माता जिन्हें छठी मैया भी कहते हैं, सहित नवग्रह देवता की प्रतिमाएं निकलीं।

      बाद में राजा ने अपने दादा श्रीकृष्ण की सलाह पर तालाब के पास मंदिर बनवाकर स्थापित किया था। पहले तालाब के पास ही सूर्य मंदिर था। बाद में ग्रामीणों ने तालाब से कुछ दूर पर मंदिर का निर्माण कर सभी प्रतिमाओं को स्थापित किया।

      तालाब के पानी से बनाया जाता है प्रसाद: बड़गांव सूर्य तालाब के पानी से ही लोहंडा का प्रसाद बनाया जाता है। व्रत करने यहां आने वाले व्रती तालाब के पानी से ही प्रसाद बनाते हैं। आसपास के बड़गांव, सूरजपुर, बेगमपुर आदि गांवों के लोग भी इसी तालाब के पानी से छह का प्रसाद बनाते हैं।

      यहां सालों भर हर रविवार को हजारों श्रद्धालु इस तालाब में स्नान कर असाध्य रोगों से मुक्ति पाते हैं। अगहन और माघ माह में भी रविवार को यहां भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

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