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    Monday, June 24, 2024
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      कहां खो गए गुल्ली-डंडा, पिटटो, लुका-छुप्पी, डोल-पत्ता, कंचे, कित-किता और छूक-छूक रेलगाड़ी जैसे खेल

      नालंदा दर्पण डेस्क। इस डिजिटली दौर में गुल्ली-डंडा, पिटटो, लुका-छुप्पी, डोल-पत्ता, कंचे, कित-किता जैसे बचपन के खेल अब बिल्कुल गायब हो गए हैं। ये पारंपरिक खेल आज से कुछ वर्ष पहले तक गांव की गलियों में बच्चे खूब खेलते थे। लेकिन टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर के गेम ने शारीरिक गतिविधियां वाले वैसे पारंपरिक खेलों को समाप्त कर दिया है।

      तब घंटों बीत जाने के बाद भी यह खेल खत्म नहीं होता था। लेकिन आज इस डिजिटल दुनिया में मैदान और आंगन के अभाव में यह खेल खो गया है। इसकी जगह मोबाइल गेम्स और टीवी ने ले ली है। अब बच्चों का मनोरंजन का टेंड बदल गया है।

      अब अभिभावक भी बच्चों को गुल्ली-डंडा, पिटटो, लुका-छुप्पी, डोल-पत्ता, कंचे, कित-किता समेत अन्य खेल खेलने-देखने की तक इजाजत नहीं देते हैं। नतीजतन वे खेल किस्से और कहानी तक सीमित रह गये हैं।

      एक दशक पहले तक लड़का हो या लड़की सभी कंचे का खेल से वाकिफ थे। घर के आंगन का यह खेल झुंड बनकर खेला जाता था। छोटे कंचों से खेले जाने वाले इस खेल में पक्ष-विपक्ष के खिलाड़ी चुने हुए कंचों (कांच की गोली) पर एक जगह खड़े होकर निशाना लगाते थे। निशाना सही लगने पर खिलाड़ी वह बाजी जीत जाते थे।

      निशाना चुकने पर दूसरे खिलाड़ी को कंचे फेंकने का मौका दिया जाता था। कंचे का खेल ज्यादातर लड़कों के बीच प्रचलित था। थे। बाजार में कंचे पैकेट में उपलब्ध होते थे। इसमें 25 पैसे की दर से कंचों की बिक्री होती थी, जो दुकानों में आसानी से मिलता था।

      छूक-छूक चली रेलगाड़ीः छोटे बच्चों के बीच छुक-छूक चली रेलगाड़ी एक घरेलू खेल हुआ करता था। टीम के दो लंबे खिलाड़ी को गेट बनने की जिम्मेवारी होती थी। जिसमें होकर अन्य बच्चे रेल गाड़ी बनाकर पर होते थे।

      खेल के दौरान एक बच्चे के पीछे एक होते थे, जो हर आगे का खिलाड़ी के कंधे को दोनों हाथों से पकड़े होता था। साथ ही धीरे-धीरे आगे बढ़ता और मुंह से छूक-छूक की आवाज निकालते थे।

      पिटटो का निशाना: खेल पिट्टो भी गली-मोहल्लों में खेला जाता है। इसके लगोरी, सतेलिया, सोटन नाम से प्रचलित हैं। इसमें बच्चों दो टीम में खेलते हैं। नौ या 11 चपटे पत्थर और बॉल खेल के मुख्य उपकरण हैं। पत्थरों से पिरामिड तैयार किया जाता है।

      तीन से पांच गज की दूर से पिरामिड पर निशाना साधा जाता है। पिरामिड बिखरने पर एक टीम जहां पत्थरों को वापस आकार देने में जुट जाती है। वहीं प्रतिद्वंदी टीम विपक्ष के खिलाड़ियों को बॉल से मार कर आउट करते हैं।

      मार दे गुल्ली उड़ा के डंडा: पिछले एक दशक दशक में आज के क्रिकेट जैसी दीवानगी गुल्ली-डंडा खेलने में बच्चों के बीच देखे जाते थे। एक समय था, जब बच्चे गुल्ली-डंडा का खेल खेलते नहीं थकते थे। डंडे से गुल्ली को मार अंक बटोरा जाता था।

      इसके लिए जमीन पर गुल्ली को रख, उसे डंडे से मारते थे। डंडे से जितनी दूर गुल्ली पहुंचती थी। उतने डेग का अंक मिलता था। प्रत्येक प्रतिभागी को गुल्ली मारने के लिए तीन से पांच मौके मिलते थे। इस बीच हवा में अगर गुल्ली को पकड़ लिया गया तो खिलाड़ी की पारी समाप्त हो जाती थी। यह पारंपरिक खेल अब लुप्त हो गया है।

      पेड़ों से लटककर खेलते थे डोल-पत्ताः पिछले एक दशक तक यह लड़कों के बीच प्रचलित खेल होता था। डोल-पत्ता बच्चों के दो टीम के बीच खेला जाता था। यह बड़े-बड़े पेड़ों के सबसे ऊपर वाले टहनी पर चढ़ना और सबसे पहले लौटना होता था।

      इसमें जिस टीम का बच्चे सबसे ऊपर वाली टहनी पर चढ़कर लौटता था, वह विजेता कहलाता था। इससे बच्चों में फुर्तिला और पड़े पर चढ़ने का अभ्यास होता था। इससे मासपेशियां मजबूत होती थी और शरीर में फुर्ती आती थी।

      लड़कियों का लोकप्रिय खेल था कित-किताः एक वक्त था, जब महिलाएं एवं युवतियां घर के आंगन तक सीमित थीं। खेल के मैदान से दूरी होने के कारण घर के आंगन में ही पैर के कदमों वाला खेल कित-किता प्रचलन में था।

      इसे खेलने के लिए जमीन पर आयताकार बनाया जाता था। इसमें अलग-अलग नौ खांच तैयार किये जाते थे। खेल परिधि के बाहर से एक पत्थर खांच में डाला जाता था। जिसे एक पैर के सहारे अगले नौ खांच तक पहुंचा कर पार किया जाता था। बिना रुके सभी नौ खांच पार करने वाले खिलाड़ी अंतिम रूप से विजेता घोषित होते थे।

      विशेषज्ञों की राय में बच्चों की एकाग्रता बढ़ाने में वैसे खेल काफी मददगार थे। पहले जहां सभी गली-मोहल्ले में एक खेल का मैदान होता था, जो पिछले कुछ साल में पूरी तरह समाप्त हो गये। खेल के मैदान में एकजुट होकर शारीरिक खेल से जुड़ते थे। इससे उनका शारीरिक व मानसिक विकास होता था।

      गुल्ली-डंडा, पिटटो जैसे खेल बच्चों की एकाग्रता और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता विकसित करते थे। वहीं कई छोटे-छोटे खेल कुशल भी बनाते थे। खेल-खेल में होने वाली थकान से बच्चों को गहरी नींद आती थी। इससे मानसिक विकास को गति मिलती थी। आज शारीरिक गतिविधि ज्यादा न होने के कारण बच्चों का वजन बढ़ रहा है और वे दिमागी रुप से कमजोर होते जा रहे हैं।

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      1 COMMENT

      1. इस तरह के सभी पारंपरिक खेलों की जगह ab ऑनलाइन गेमिंग ले चुका है
        आप सभी अपने बच्चों से कहिए आउटडोर गेम खेलें तथा इस तरह के पारंपरिक खेल जो की सुरक्षित हो उसमें जरूर भागीदारी बने

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